Param Pujya Sant Shri Asaramji, endearingly called 'Bapu', is a Self-Realized Saint from India. Pujya Bapuji preaches the existence of One Supreme Conscious in every human being; be it Hindu, Muslim, Jain, Christian, Sikh or anyone else. Bapuji represents a confluence of Bhakti Yoga, Gyan Yoga & Karma Yoga. This website is a humble attempt to spread the divine message of Pujya Bapuji.
Friday, July 25, 2008
सावन में भगवान् शिव जी की पूजा का विशेष महत्त्व है । बिल्व पत्र भगवान् शंकर को बहुत प्रिय हैं । बिल्व के तीन पत्र माना रजो गुण, तमो गुण और सतो गुण भगवान् शंभ सदाशिव को अर्पित कर देना । बिल्व पत्र वायु सम्बन्धी रोगों को समाप्त करता है ।
बुद्धि की ऊंचाई का फल है परिस्थितियों में सम रहना ।
मरने वाले शरीर को हम अपना मानते हैं इसीलिए हम सोये हुए हैं ।
"मोह निशा सब सोवन हारा ..... "
सारे विश्व का राज्य मिल जाए और ब्रह्म सुख न मिला तो भी घाटा है ।
तीन टूक कोपीन की भाजी बिना लूण .....
"वो ना थे मुझ से दूर ना मैं उनसे दूर था ।
आता ना नजर तो नजर का कसूर था ॥ "
मनुष्य जन्म सार्थक करने के लिए बुद्धि मिली है । खाली पेट भरने के लिए , मजदूरी करके जीवन बिताने के लिए ही हमारा जन्म नही हुआ है ।
ह्रदय में बसे हृदयेश्वर को पाने के लिए वास्तविकता में हमारा जन्म हुआ है ।
मनुष्य तू इतना ऊँचा है कि तू भगवान् का गुरु बन सकता है , भगवान् का भक्त बन सकता है , भगवान् का सखा बन सकता है , भगवान् का मित्र बन सकता है , भगवान् का प्रेमी बन सकता है और तो और भगवान् का माँ -बाप भी बन सकता है ।
भगवान् भाव के भूखे हैं वो किसी व्यंजन इत्यादि से खुश नही होते ।
बुद्धि का आदर करना है तो ये बात ठान लो कि एक है नित्य और एक है अनित्य । प्रकृति अनित्य है और परमात्मा नित्य है ।
सावन में हरा शाक और दूध ज्यादा नहीं लेना चाहिए ।
बिनु सत्संग विवेक न होई , राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ..
नारायण हरि
--आज सुबह (२५ जुलाई २००८) सोनी टेलीविजन पर प्रसारित सत्संग के कुछ अनमोल वचन ।
यह पूज्य गुरुदेव की अमृतमयी वाणी को सुन कर लिखा गया है अतः लिखने में त्रुटि होने की संभावना है । कृपया यदि कोई त्रुटि हो गई हो तो क्षमा करें।
Thursday, July 24, 2008
सारा जगत वासुदेव की सत्ता से भरा हुआ है ।
भले वासुदेव परमात्मा का अनुभव अभी ना होता परन्तु ये पक्का कर लो की वह सर्व व्याप्त है ।
ऐसा खेल रच्यो मेरे दाता , जहाँ देखूं वहां तू को तू ......
वासुदेव सर्वमिति ....
मेरे मन की हो! यदि ऐसी भावना है तो बड़ा भारी दोष है ।
भगवन बड़े दयालु हैं की सब हमारी चाही नही होती . गुरुदेव ने बहुत से उदाहरण भी दिए ।
अपनी चाही का आग्रह मत करो ।
नौ ग्रह भी इतना नुक्सान नही कर सकते जितना अपनी चाही जैसा ग्रह नुक्सान कर सकता है ।
किसी को डांटना भी पड़ता है तो "परस्परं भावयन्तु" के भाव रखते हुए कि उसका मंगल कैसे हो? उसका विकास कैसे हो?
करने की शक्ति , मानाने की शक्ति और जानने की शक्ति का सदुपयोग करो ।
परमात्मा जो समग्र सृष्टि को चला रहा है वो तुम्हारा परम हितैषी है , ऐसा अडिग विश्वास रखो ।
जानो तो अपने को जानो , करो तो दूसरों के हित की करो और मानो तो प्रभु को मानो ।
संत कबीर वाणी :
"हरि सम जग कछु वास्तु नहीं , प्रेम पंथ सम पंथ .
सतगुरु सम सज्जन नहीं , गीता सम नहीं ग्रन्थ "
नारायण हरि
--आज सुबह (२४ जुलाई २००८) सोनी टेलीविजन पर प्रसारित सत्संग के कुछ अनमोल वचन ।
यह पूज्य गुरुदेव की अमृतमयी वाणी को सुन कर लिखा गया है अतः लिखने में त्रुटि होने की संभावना है । कृपया यदि कोई त्रुटि हो गई हो तो क्षमा करें।
Tuesday, July 22, 2008
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द
गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु मेरा देऊ , अलख अभेऊ , सर्व पूज चरण गुरु सेवऊ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु का दर्शन .... देख - देख जीवां , गुरु के चरण धोये -धोये पीवां
गुरु बिन अवर नही मैं ठाऊँ , अनबिन जपऊ गुरु गुरु नाऊँ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु मेरा ज्ञान , गुरु हिरदय ध्यान , गुरु गोपाल पुरख भगवान्
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
ऐसे गुरु को बल-बल जाइये ..-२ आप मुक्त मोहे तारें ..
गुरु की शरण रहो कर जोड़े , गुरु बिना मैं नही होर
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु बहुत तारे भव पार , गुरु सेवा जम से छुटकार
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
अंधकार में गुरु मंत्र उजारा , गुरु के संग सजल निस्तारा
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु पूरा पाईया बडभागी , गुरु की सेवा जिथ ना लागी
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
संकलित : पंजाबी भजन
Thursday, July 17, 2008
बापूजी ने इस मंत्र का जप बताया है गुरुकुल की शान्ति हेतु :
OM NAMO SIDDHI VINAYKAY GURUKUL ASHRAME SHANTI KARTRE SARVA VIGHNA PRASHMNAY SHRI OM SWAHA !!
ॐ नमो सिद्धि विनायकाय गुरुकुल आश्रम शांति कर्तरे सर्व विघ्न प्रशम्नाय श्री ॐ स्वाहा ।
अधिकं जपं , अधिकं फलं । अतः अधिक से अधिक इस मंत्र का जप करने की कृपा करें ।
Tuesday, July 15, 2008
अनमोल वचन :
सर्व दृश्य को भूलना
जानके असत् संसार ।
चित्त ब्रह्म में लीन कर
यही है सच्चा सार ॥
- परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू
'गीता'
विवेकरूपी वृक्षों का
एक अपूर्व बगीचा है
यह सब सुखों की नींव है
सिद्धान्त-रत्नों का भण्डार है
नवरसरूपी अमृत से
भरा हुआ समुद्र है
खुला हुआ परम धाम है और
सब विद्याओं की मूल भूमि है
- संत ज्ञानेश्वर महाराज
Tuesday, July 08, 2008
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं वग्वादिनि सरस्वति मम जिह्वाग्रे वद वद ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं नमः स्वाहा
इस मंत्र को आषाढ मास मे जब उत्तराषाढा नक्षत्र हो तब अर्थात 18 जुलाई २००८ को दिन मे १०८ बार जप ले
फिर इसी दिन की रात्रि के समय ११ से १२ बजे के बीच जीभ पर लाल चंदन से ' ह्रीं ' मन्त्र लिख दे
जिसकी जीभ पर यह मंत्र इस विधि से लिखा जायेगा, उसे विद्या लाभ तथा विद्वत्ता की प्राप्ति होगी
सभी लोग इसका लाभ ले तथा दुसरो को दिलावे
Monday, June 30, 2008
तुम जियो तो ऐसा जियो कि जिसे देखो उसमें बस, अपना आत्मा-ब्रह्म दिखे
ऐसा खाओ कि जो खाओ वह प्रसाद हो जाए ।
जीवन बड़ा कीमती है वैमनस्य और विग्रह से अपने शक्तियों को क्षीण क्यों करना ?
व्यर्थ की चर्चा और व्यर्थ का वाणी-विलास करने से अपनेको बचाओ
सत्य परमात्मा में मन को लगाओ इसी जीवन में धन्यता का अनुभव करो
- परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू
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बारह कोस चलकर जाने से भी यदि सत्पुरुष के दर्शन मिलते हों तो मैं पैदल चलकर जाने के लिए तैयार हूँ क्योंकि ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष के दर्शन से कैसा आध्यात्मिक लाभ मिलता है वह मैं अच्छी प्रकार से जानता हूँ
- स्वामी विवेकानन्द
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तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना
अमानिना मानदेन कीर्तनीयो सदा हरिः
तिनके से भी हलका, वृक्ष से भी अधिक सहनशील, स्वयं मान रहित रहकर तथा दूसरों को मान देकर नित्य भगवान श्रीहरि के नाम का संकीर्तन करना चाहिए
- चैतन्य महाप्रभु
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धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः धन्या च वसुधा देवी यत्र स्याद गुरुभक्तता
हे पार्वती ! जिसके अन्दर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका कुल गोत्र / वंश धन्य है, उसके वंश में, जन्म लेनेवाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है
- भगवान शिवजी
Thursday, June 05, 2008
An old deaf man regularly attended the satsanga of a saint. He suffered from neural deafness. He was as deaf as a post and couldn't hear even a single word. Somebody informed the saint, “Babaji! That old man sitting there is totally deaf even though he occasionally laughs in the course of the satsanga.”
Deaf people laugh twice – first, when all laugh in the course of satsanga and the second, when they figure out what might have transpired.
Babaji said, “Why does he come to satsanga if he is deaf? He comes every day and is always right on time. He keeps sitting for hours. He is not even among those who slip away in the middle of satsanga.”
Babaji thought, 'If he is deaf and cannot listen; how can he enjoy, and without enjoyment he should have left; but he stays put all the while!'
Babaji called the old man near and said in a loud voice into the old man's ears, “Can you listen to the satsanga?”
The old man said, “What did you say, Babaji?”
Babaji raised the loudness of his voice further and said, “Do you hear me?”
“Where do you want me to go?”
Babaji realized that he was totally deaf. He took a paper and pen from the attendant and queried the old man in writing.
The old man said, “My hearing is completely impaired. I cannot hear a word.”
The dialogue continued through the medium of written words.
“Then, why do you come to satsanga?”
“Babaji! I can not hear but I do know that God-Realized one's get absorbed in the Supreme Self before speaking. When a worldly man speaks, his words originate from the mind and the intellect; but the words of a Knower of the Supreme Brahman originate from the Atman. Of course, I cannot listen to your ambrosial words, but their pious vibrations do touch my persona. Secondly, I also earn the merit of sitting amidst the holy souls who come to listen to your nectarine precepts.”
“I am the eldest member of my family. The younger ones tend to follow in the footsteps of the elders. As I come to satsanga, my elder son too has started coming here. Previously, I even resorted to some tricks to bring him to the satsanga. I brought him here and he in turn brought his wife. The wife brought the children. Slowly the entire family has started coming to satsanga. The whole family is inclined to attend the satsanga.”
Never mind if the discourse on Brahman, or the satsanga of Self-Knowledge is not understood. Even if one is not able to hear, simply attending it earns one so much religious merit that sins and afflictions of his countless births are destroyed. One's entire family is also benefitted. Now, can there be any doubt that he who listens to it with rapt attention and reverence then reflects and contemplates on it constantly, will attain the Final Salvation?
Saturday, April 26, 2008
Monday, April 21, 2008
करो संकल्प कुछ बढ़ कर , घड़ी यह आज आई है
मुबारक जन्म दिन तुमको , बधाई है - बधाई है
बधाई है तुमने स्वार्थ सुख को व्यर्थ समझा है
बधाई है कि तुमने जिन्दगी का अर्थ समझा है
लगे तुम मानने परमार्थ ही सच्ची कमाई है
बधाई है कि पहनी तुमने, सदगुण की सुमन माला
बधाई है कि तुमने महाकाल को ही है पहचाना
ये सुरभि सत्कर्म की आदत तुममे सदा समाई है
हटाई है कि तुमने दंभ ईर्ष्या द्वेष जीवन से
बधाई है कि ह्रदय में प्यार अनंत रखने को
बदलता है जगत ये बात जग को नित्य सिखाई है
बधाई है कि तुमने व्रत लिया है लोक मंगल का
बधाई है कि समझा है लक्ष्य जीवन के हर पल का
करो "शुभ" लक्ष्य जीवन का घड़ी यह आज आई है
करो संकल्प कुछ बढ़ कर घड़ी यह आज आई है
नारायण हरि
तीन लोक की मेरे दाता करे रखवाली
कैसे - कैसे अनुभव अपने दुनिया को बतलायें
महिमा तेरी गा पायें वो शब्द कहाँ से लायें
तेरे नाम की ज्योत से है -२ दुनिया उजियाली ,
शान निराली साँई तेरी शान निराली .....
मुख मंडल पर आभा ऐसे जैसे सूरज चमके
एक झलक से छंट जाते हैं काले बदल गम के
भर देते हैं झोली उसकी -२ जो भी आता खाली
शान निराली साँई तेरी शान निराली .....
ब्रह्मज्ञान का दिया जलाकर जग उजियारा करते
सत्संग रुपी गंगाजल से सबको निर्मल करते
हर दर पर ना मस्तक टेकें -२ हम बापू के सवाली
शान निराली साँई तेरी शान निराली .....
संत शरण जो जन पड़े वो जन उद्धरणहार
संत की निंदा नानका बहुरि - बहुरि अवतार
सत्संग रुपी "शुभ" अमृत की -२ भर-भर देते प्याली
शान निराली साँई तेरी शान निराली .....
मैं मेरी के फंद हटाकर प्रभु से नाता जोड़ते
सुनकर के फरियाद भगत की नंगे पैरों दौड़ते
हमने पाकर शरण गुरु की -२ किस्मत अपनी जगा ली
शान निराली साँई तेरी शान निराली .....
रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
Thursday, April 17, 2008
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एक दिन भगवान श्री राम चंद्र जी और भगवती सीता जी झूले पर विराजमान थे । हनुमान जी आए और झूला झुलाने लगे । सीता जी ने कहा : "हनुमान ! पानी ... " रामजी ने कहा : "झूला चलाओ ." हनुमान जी झूले की रस्सी हाथ में लिए हुए पानी लेने गए ; झूला भी झूल रहा है और पानी भी ले आए ।
इस तरह हनुमानजी पूरी कुशलता से कर्म करते । कार्य की सफलता का सामर्थ्य कहाँ है , यह जानते हैं हनुमानजी । वे विश्रांति पाना जानते हैं । हनुमान जी को न परिणाम का भय है , न कर्मफल के भोग की कामना है, न लापरवाही है और न पलायनवादिता है ।
Tuesday, April 15, 2008
हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे
गुरूजी हमारे , भक्तों के दुलारे
हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे
देखो मेरे गुरुवर की शान निराली , सत्संग की भर -भर देते प्याली
किया भक्तों का उद्धार गुरुजी हमारे , हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे ...
कैसा मंगल दिवस है आया , भक्तों ने बड़ी धूम से मनाया
कीर्तन की बहती बयार गुरुजी हमारे , हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे ...
जन्म से पहले सौदागर आया , सुंदर सा एक झूला भी लाया
हुआ धरती पर अवतार गुरुजी हमारे , हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे ...
ज्ञान गगन के सूर्य हैं बापू , शील शांत माधुर्य हैं बापू
सोलह कला के अवतार गुरुजी हमारे , हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे ...
"शुभ" जगत में आनंद छाया , मंगलाचरण सारे विश्व में गाया
कलिकाल में तारणहार गुरुजी हमारे , हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे ...
रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
Friday, April 11, 2008
पिता थाऊमल के घर जन्मे -२ , तेरी जय हो मेह्गिबा के लाल
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
मैं वारी जाऊँ बापू जी , बलिहारी जाऊँ बापू जी
मोटेरा तेरा धाम है -२ , तेरे भक्त आवे दरबार
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
भक्तो के तुम कष्ट मिटते -२ , तेरी महिमा अपरम्पार
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
भक्त जो नाम दान हैं लेते -२ , वो तर जावें भव पार
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
आप तो बापू ज्ञान बांटते -२ , रहे भरा ज्ञान भंडार
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
ध्यान योग में ख़ुद को तपाया -२ , बने आसुमल से आसाराम
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
नाथ सुनाऊँ अनुभव अपना -२ , हो गया हरि से प्यार
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
हम भी बापू बालक तेरे -२ , "शुभ" चरणों में पावे वास
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
Wednesday, April 09, 2008
अहमदाबाद चेटीचंड शिविर (अप्रैल २००८) के मुख्य बिन्दु :
1. अनित्य में मन नहीं लगाकर नित्य की और बढ़ना शुरू करना चाहिए । समय तेज़ी से निकल रहा है ।
2. रोज संध्या का समय ६५ सेकंड के लिए आन्तरिक कुम्भक और ४० सेकंड के लिए वाह्य कुम्भक पक्का करो । ऐसे ७ प्राणायाम करें ।
3. गहरी श्वास अन्दर लेते समय सोचे की ईश्वरीय चैतन्य को अन्दर ले रहे है .... फिर श्वास रोके तो सोचें कि मैं प्रभु का और प्रभु मेरे, बस ...
और श्वास बाहर निकालते समय सोचें कि सारी पुरानी बातें और सारे निगेटिव विचार बाहर निकल रहे हैं . ऐसे रोजाना प्रयोग करें और ॐ कि धुन में ध्यान में बैठ जायें । ऐसा ४० दिन करें बहुत आध्यात्मिक उन्नति होगी।
4. पेट ख़राब रहता हो तो बाहरी कुम्भक में त्रिबंध लगाकर बैठकर पेट को अंदर-बाहर करिये और मन में रं रं रं जप करिये।
5. जो भी प्राणायाम करें उसे त्रिबंध लगाकर ही करें ।
6. श्वासों श्वास का ध्यान अनिवार्य ।
7. शिशंक आसन में रोज़ बैठना है । २ मिनट बडों के लिए और ३ मिनट स्टूडेंट्स के लिए । वज्र आसन में बैठकर जब सिर को ज़मीन पर लगाते हैं उसे "शिशंक" आसन कहते हैं ।
ध्यान दें : जब बाहरी कुम्भक करें तब वज्र आसन में बैठकर करें ।
8. इन दिनों बिना नमक के खाना सेहत के लिए अच्छा है ।
9. इन दिनों जप बढ़ा दे जब तक नवरात्र हैं ।
10. आंवला रोज़ खाने से आंते शुद्ध होती है । इन दिनों आंवला खाइए ।
11.श्रद्धा का जीवन में बहुत लाभ है । ये विश्व श्रद्धा से चल रहा है न की किसी और से । श्रद्धा बढाओ और भगवान में प्रीती ।
12. रोज़ सुबह उठकर थोडी देर भगवान से बातें करें और रात को सोने से पहले भी । पक्का नियम बना लें ।
शिविर में पधारे एक साधक भाई के सहयोग से संकलित ।
Tuesday, April 08, 2008
॥ दोहा ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
॥ चौपाई ॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही। जलधि लाँधि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोइ लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरु देव की नाई॥
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढै हनुमान चलीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
॥ दोहा ॥
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
Thursday, April 03, 2008
--परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू
--१--
कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती ।
करमूले तु गोविंद: प्रभाते करदर्शनम् ॥
हर रोज प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठना, ईश्वर का ध्यान और 'कर दर्शन' करके बिस्तर छोड़ना तथा सूर्योदय से पूर्व स्नान करना ।
--२--
अपनी सुषुप्त शक्तियाँ जगाने एवं एकाग्रता के विकास के लिए नियमित रूप से गुरुमंत्र का जप , ईश्वर का ध्यान और त्राटक करना ।
--३--
बुद्धि शक्ति के विकास एवं शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हर रोज प्रातः सूर्य को अर्घ्य देना , सूर्य नमस्कार एवं आसन करना ।
--४--
स्मरण शक्ति के विकास के लिए नियमित रूप से भ्रामरी प्राणायाम करना एवं तुलसी के ५-७ पत्ते खाकर एक गिलास पानी पीना ।
--५--
माता -पिता एवं गुरुजनों को प्रणाम करना । इससे जीवन में आयु, विद्या, यश, व बल की वृद्धि होती है ।
--६--
महान बनने का दृढ़ संकल्प करना तथा उसे हर रोज दोहराना, ख़राब संगति एवं व्यसनों का दृढ़तापूर्वक त्याग कर अच्छे मित्रों की संगति करना तथा चुस्तता से ब्रह्मचर्य का पालन करना ।
--७--
समय का सदुपयोग करना, एकाग्रता से विद्या-अध्ययन करना और मिले हुए ग्रहकार्य को हर रोज नियमित रूप से पूरा करना ।
--८--
हर रोज सोने से पूर्व पूरे दिन की परिचर्या का सिंहावलोकन करना और गलतियों को फिर न दोहराने का संकल्प करना, तत्पश्चात ईश्वर का ध्यान करते हुए सोना
Wednesday, March 26, 2008
बन जाओ चाहे सूरमा , बनो या मालामाल ।
सतगुरु भक्ति नही दिल में , तो सबसे बड़े कंगाल ॥
मधु जैसे हैं मधुर वो , चित्त है बहुत विशाल ।
दया धर्म की मूर्ति वो , मेरे सतगुरु दीन दयाल ॥
हम साधक जिन्हें पूजते , वो सतगुरु आसाराम ।
नाम रटन से जिनके , बनते बिगड़े काम ॥
गुरुदेव की छाया में , जीवन वृक्ष बढे ।
रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"

1। Om Avidyaam Juhomi Svaha
2। Om Asmita Juhomi Svaha
अर्थ : अपने शरीर से जुड़ कर हमने जो मान्यताएं पकड़ रखी हैं , धन की , पद की , आदि उन सब को हम स्वाहा करते हैं ।
3। Om Raagam Juhomi Svaha
अर्थ : जिसमें राग होता है उसके दुर्गुण नहीं दिखते , और जिसमें द्वेष होता है उसके गुण नहीं दिखते । हम किसी भी व्यक्ति , वस्तु अथवा परिस्थिति से राग न करें ; राग को हम स्वाहा करते हैं ।
4। Om Dvesham Juhomi Svaha
अर्थ : किसी भी व्यक्ति , वस्तु अथवा परिस्थिति से द्वेष न करें ; द्वेष को भी हम स्वाहा करते हैं ।
5। Om Abhinivesham Juhomi Svaha
अर्थ : मृत्यु का भय निकाल दें ; यह शरीर मैं हूँ और मैं मर जाऊंगा इस दुर्बुद्धि का मैं त्याग करता हूँ ; जो शरीर मरता है वह मैं अभी से नहीं हूँ ; जो शरीर के मरने के बाद भी रहता है , वह मैं अभी से हूँ ।
Friday, March 14, 2008
होली का उडे गुलाल -गुलाल , बापू जी तोरे अंगना में
बापू जी तोरे अंगना में, साँईं जी तोरे अंगना में
होली का उडे गुलाल -गुलाल , बापू जी तोरे अंगना में
त्यौहार होली का आया है भक्तों ने मंगल गाया है -२
सब नाचे दे-दे ताल हो ताल , बापू जी तोरे अंगना में
होली का उडे गुलाल -गुलाल , बापू जी तोरे अंगना में
पिचकारी प्रेम की रंग भरी , बापू ने ऐसी दया करी
मिटा जनम-मरण जंजाल - जंजाल , बापू जी तोरे अंगना में
होली का उडे गुलाल -गुलाल , बापू जी तोरे अंगना में
श्रद्धा के सुमन चढा दे हम , बापू को गुलाल लगा दें हम
"शुभ" होली करें हर साल - हर साल , बापू जी तोरे अंगना में
होली का उडे गुलाल -गुलाल , बापू जी तोरे अंगना में
सतगुरु शरण में आ जाओ , सुख शान्ति वैभव पा जाओ
हो जाओ मालामाल - मालामाल , बापू जी तोरे अंगना में
होली का उडे गुलाल -गुलाल , बापू जी तोरे अंगना में
रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
Saturday, March 08, 2008
Tuesday, March 04, 2008
ॐ नमः शिवाय ॥ ॐ नमः शिवाय ॥
देवाधिदेव हे महादेव .... देवाधिदेव हे महादेव ....
हमने मन मन्दिर सजाया ...., आकर तो देख - आकर तो देख
देवाधिदेव हे महादेव .........
तीनों लोक रहते तेरे चरणों में देवा , हमको भी दे दो नाथ चरणों की सेवा
हम भी तर जायें बालक तेरे ..... भव सिंधु से - भव सिंधु से
देवाधिदेव हे महादेव .........
रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
९९९०३४८६६४
Merits of Shivaratri Puja According to Shiva Purana, sincere worship of Lord Shiva yields merits including spiritual growth for the devotees. It also provides extensive details on the right way to perform Shivratri Puja. Shiva Purana further says that performing abhisheka of Shiva Linga with six different dravyas including milk, yoghurt, honey, ghee, sugar and water while chanting Sri Rudram, Chamakam and Dasa Shanthi pleases Lord Shiva the most.

According to the mythology, each of these dravya used in the abhisheka blesses a unique quality:
Milk is for the blessing of purity and piousness.
Yogurt is for prosperity and progeny.
Honey is for sweet speech.
Ghee is for victory.
Sugar is for happiness.
Water is for purity.
Besides, worship of Lord Shiva on Shivratri is also considered to be extremely beneficial for women. While, married women pray to Shiva for the well being of their husbands and sons, unmarried women pray for a husband like Shiva, who is considered to be the ideal husband.
Lord Shiva appears in a meditating but ever-happy posture. He has matted hair which holds the flowing Ganges river and a crescent moon, a serpent coiled around his neck, a trident (trishul) in his one hand and ashes all over his body. The Lord's attributes represent his victory over the demonic activity, and calmness of human nature. He is known as the "giver" god. His vehicle is a bull (symbol of happiness and strength) named Nandi. Shiva-Linga, a sign of the Lord, is adored instead of him. Shiva temples have Shiva-Linga as the main deity.
Maha Shivaratri is celebrated throughout the country; it is particularly popular in Uttar Pradesh. Maha Shivratri falls on the I3th (or I4th) day of the dark half of 'Phalgun' (February-March). The name means "the night of Shiva". The ceremonies take place chiefly at night. This is a festival observed in honour of Lord Shiva and it is believed that on this day Lord Shiva was married to Parvati.
On this festival people worship 'Shiva - the Destroyer'. This night marks the night when Lord Shiva danced the 'Tandav'. In Andhra Pradesh, pilgrims throng the Sri Kalahasteshwara Temple at Kalahasti and the Bharamarambha Malikarjunaswamy Temple at Srisailam.
Shivji is called 'Bhola' (innocent, kind hearted, easily pleased) because it is believed that He is easily pleased and grants boons instantly (hence he is called Ashutosh).
Thursday, February 28, 2008
श्री आसाराम नाम को , पूजे है जग सारा ॥
लीला तुम्हारी अद्भुत न्यारी , कैसे - कैसे खेल हैं ?
रूप मनुज का लेकर तुमने , किया ब्रह्म से मेल है
साँई लीलाशाह के नाम का , लेकर बापू सहारा
कितना शुभ प्यारा , बापू नाम तुम्हारा ............
जन्म से पहले एक सौदागर , सुंदर झूला लाया
उतरेगा नक्षत्र अवनी पर , थाऊमल को बताया
माँ मेंहगीबा की कोख को , धन्य कहे जग सारा
कितना शुभ प्यारा , बापू नाम तुम्हारा ............
नाम रतन से जिनके केवल , बनते बिगड़े काम हैं
योगलीला श्री आसारामायण , में पाते विश्राम हैं
पानी हो मुक्ति , ले लो तुम भी सहारा
कितना "शुभ" प्यारा , बापू नाम तुम्हारा ............
"शुभ" चरनन में प्रीत बढे कुछ , ऐसा करो उपाय
रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
Wednesday, February 27, 2008
) बनाये तथा उसके बाजू में पूज्य बापू जी की तस्वीर रख दें। फिर जमीन पर सफ़ेद या केसरी रंग का नया , पतला कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर गेहूँ के दानों से स्वस्तिक बना कर उस पर पानी का लोटा रख दें । लोटे के ऊपरी भाग में आम के पत्ते रखें व उन पर नारियल रख दें । अनुष्ठान की समाप्ति पर लोटे का जल तुलसी की जड़ में साल दें । गेहूँ के दाने पक्षियों के डालें , नारियल प्रसाद रूप में बाँट दें या बहती जल में प्रवाहित कर दें । गुरुमंत्र के जप से १०८ आहुतियाँ दे कर हवन कर लें तथा एक या तीन अथवा पाँच -सात कन्याओं को भोजन करायें । दृढ श्रद्धा -विश्वास , संयम तथा तत्परता पूर्वक इस विधि से अनुष्ठान करने वालो की मनोकामना पूर्ण होने में मदद मिलती है ।
(स्वामी सुरेशानंद जी के प्रवचन से ) - लोक कल्याण सेतु : अंक १२६ । १६ दिसम्बर २००७ से १५ जनवरी २००८
Tuesday, February 26, 2008
हे प्रभु आनंद दाता, ज्ञान हमको दीजिये
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये
लीजिये हमको शरण में हम सदाचारी बनें
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
निंदा किसीकी हम किसीसे भूल कर भी न करें
ईर्ष्या कभी भी हम किसीसे भूल कर भी न करें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
सत्य बोलें झूठ त्यागें मेल आपस में करें
दिव्य जीवन हो हमारा यश तेरा गाया करें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
जाये हमारी आयु हे प्रभु लोक के उपकार में
हाथ ड़ालें हम कभी न भूलकर अपकार में
हे प्रभु आनंद दाता.................................
मातृभूमि मातृसेवा हो अधिक प्यारी हमें
देश की सेवा करें निज देश हितकारी बनें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
कीजिये हम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा ॐ
प्रेम से हम दुःखीजनों की नित्य सेवा करें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
Friday, February 15, 2008
(पूज्य बापू जी के सत्संग -प्रवचन से)

'गीता' में मुख्य रूप से बारह विद्याएँ हैं :
१. शोक-निवृत्ति की विद्या
२. कर्तव्य कर्म करने की विद्या
३. त्याग करने की विद्या
४. भोजन करने की विद्या
५. पाप न लगने की विद्या
६. विषय-सेवन की विद्या
७. भगवद अर्पण की विद्या
८. दान देने की विद्या
९. यज्ञ विद्या
१०. पूजन विद्या
११. समता लाने की विद्या
१२. कर्मों को सत बनाने की विद्या
आश्रम द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका 'ऋषि प्रसाद' के अंक १७६ , अगस्त २००७ से संकलित
विस्तार आलेख के लिए कृपया उपरोक्त अंक पढ़ें .
Wednesday, February 13, 2008
---: १४ फरवरी २००८ :---
इस वर्ष १४ फरवरी को भारतीय संस्कृति की महत्ता को समझाने वाले ३ भिन्न उत्सव एक साथ हमें प्राप्त हो रहे हैं । पूज्य गुरुदेव ने भिन्न - भिन्न स्थानों पर आयोजित हुए सत्संग कार्यक्रमों में हमें हमारी संस्कृति के और निकट जाने की राह समझाई है । धन्य - धन्य हैं हम बालक / साधक जिन्हें ईश्वर साक्षात् नर रूप में मिले हैं ।
१) मातृ - पितृ पूजन दिवस
२) भीष्म तर्पण दिवस
३) माघ - शुक्ल अष्टमी
प्रत्येक त्यौहार का अपना - अपना महत्त्व है । संक्षेप में जानते है :....
मातृ - पितृ पूजन दिवस :- अपनी भारतीय संस्कृति बालकों को छोटी उम्र में ही बड़ी ऊँचाईयों पर ले जाना चाहती है। इसमें सरल छोटे-छोटे सूत्रों द्वारा ऊँचा, कल्याणकारी ज्ञान बच्चों के हृदय में बैठाने की सुन्दर व्यवस्था है।
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। माता-पिता एवं गुरू हमारे हितैषी है, अतः हम उनका आदर तो करें ही, साथ ही साथ उनमें भगवान के दर्शन कर उन्हें प्रणाम करें, उनका पूजन करें। आज्ञापालन के लिए आदरभाव पर्याप्त है परन्तु उसमें प्रेम की मिठास लाने के लिए पूज्यभाव आवश्यक है। पूज्यभाव से आज्ञापालन बंधनरूप न बनकर पूजारूप पवित्र, रसमय एवं सहज कर्म हो जाएगा।
पानी को ऊपर चढ़ाना हो तो बल लगाना पड़ता है। लिफ्ट से कुछ ऊपर ले जाना हो तो ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। पानी को भाप बनकर ऊपर उठना हो तो ताप सहना पड़ता है। गुल्ली को ऊपर उठने के लिए डंडा सहना पड़ता है। परन्तु प्यारे विद्यार्थियो! कैसी अनोखी है अपनी भारतीय सनातन संस्कृति कि जिसके ऋषियों महापुरूषों ने इस सूत्र द्वारा जीवन उन्नति को एक सहज, आनंददायक खेल बना दिया।
इस सूत्र को जिन्होंने भी अपना बना लिया वे खुद आदरणीय बन गये, पूजनीय बन गये। भगवान श्रीरामजी ने माता-पिता व गुरू को देव मानकर उनके आदर पूजन की ऐसी मर्यादा स्थापित की कि आज भी मर्यादापुरूषोत्तम श्रीरामजी की जय कह कर उनकी यशोगाथा गाय़ी जाती है। भगवान श्री कृष्ण ने नंदनंदन, यशोदानंदन बनकर नंद-घर में आनंद की वर्षा की, उनकी प्रसन्नता प्राप्त की तथा गुरू सांदीपनी के आश्रम में रहकर उनकी खूब प्रेम एवं निष्ठापूर्वक सेवा की। उन्होंने युधिष्ठिर महाराज के राजसूय यज्ञ में उपस्थित गुरूजनों, संत-महापुरूषों एवं ब्राह्मणों के चरण पखारने की सेवा भी अपने जिम्मे ली थी। उनकी ऐसी कर्म-कुशलता ने उन्हें कर्मयोगी भगवान श्री कृष्ण के रूप में जन-जन के दिलों में पूजनीय स्थान दिला दिया। मातृ-पितृ एवं गुरू भक्ति की पावन माला में भगवान गणेष जी, पितामह भीष्म, श्रवणकुमार, पुण्डलिक, आरूणि, उपमन्यु, तोटकाचार्य आदि कई सुरभित पुष्प हैं।
तोटक नाम का आद्य शंकराचार्य जी का शिष्य, जिसे अन्य शिष्य अज्ञानी, मूर्ख कहते थे, उसने आचार्यदेवो भव सूत्र को दृढ़ता से पकड़ लिया। परिणाम सभी जानते हैं कि सदगुरू की कृपा से उसे बिना पढ़े ही सभी शास्त्रों का ज्ञान हो गया और वे तोटकाचार्य के रूप में विख्यात व सम्मानित हुआ। वर्तमान युग का एक बालक बचपन में देर रात तक अपने पिताश्री के चरण दबाता था। उसके पिता जी उसे बार-बार कहते - बेटा! अब सो जाओ। बहुत रात हो गयी है। फिर भी वह प्रेम पूर्वक आग्रह करते हुए सेवा में लगा रहता था। उसके पूज्य पिता अपने पुत्र की अथक सेवा से प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद देते -
पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम। लोगों के तुमसे सदा, पूरण होंगे काम।
अपनी माताश्री की भी उसने उनके जीवन के आखिरी क्षण तक खूब सेवा की।
य़ुवावस्था प्राप्त होने पर उस बालक भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की भांति गुरू के श्रीचरणों में खूब आदर प्रेम रखते हुए सेवा तपोमय जीवन बिताया। गुरूद्वार पर सहे वे कसौटी-दुःख उसके लिए आखिर परम सुख के दाता साबित हुए। आज वही बालक महान संत के रूप में विश्ववंदनीय होकर करोड़ों-करोड़ों लोगों के द्वारा पूजित हो रहा है। ये महापुरूष अपने सत्संग में यदा-कदा अपने गुरूद्वार के जीवन प्रसंगों का जिक्र करके कबीरजी का यह दोहा दोहराते हैं -
गुरू के सम्मुख जाये के सहे कसौटी दुःख। कह कबीर ता दुःख पर कोटि वारूँ सुख।।
सदगुरू जैसा परम हितैषी संसार में दूसरा कोई नहीं है। आचार्यदेवो भव, यह शास्त्र-वचन मात्र वचन नहीं है। यह सभी महापुरूषों का अपना अनुभव है।
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। यह सूत्र इन महापुरूष के जीवन में मूर्तिमान बनकर प्रकाशित हो रहा है और इसी की फलसिद्धि है कि इनकी पूजनीया माताश्री व सदगुरूदेव - दोनों ने अंतिम क्षणों में अपना शीश अपने प्रिय पुत्र व शिष्य की गोद में रखना पसंद किया। खोजो तो उस बालक का नाम जिसने मातृ-पितृ-गुरू भक्ति की ऐसी पावन मिसाल कायम की।
आज के बालकों को इन उदाहरणों से मातृ-पितृ-गुरूभक्ति की शिक्षा लेकर माता-पिता एवं गुरू की प्रसन्नता प्राप्त करते हुए अपने जीवन को उन्नति के रास्ते ले जाना चाहिए।
भीष्म तर्पण दिवस एवं शुक्ल अष्टमी :- भीष्म जी को जल अर्पण करें और संतान की प्राप्ति की इच्छा करें तो तेजस्वी आत्मा आती है ऐसा 14 फरवरी है इस बार शुक्ल अष्टमी तिथि, धवल निबंध ग्रंथ के अनुसार इस तिथि को भीष्म जी का तर्पण दिवस भी है ब्रह्मचारी भीष्म जी का तर्पण करने से लड़के लड़कियाँ तेजस्वी हो सकते हैं
नारायण हरि
Wednesday, February 06, 2008
प्रति वर्ष १४ फरवरी को मनाये मात्र - पितृ पूजन दिवस
कैसे मनाये मात्र - पितृ पूजन दिवस ?

इस दिवस बच्चे-बच्चियां माता - पिता को प्रणाम करे तथा माता - पिता अपने संतानों को प्रेम करे ! संतान अपने माता - पिता के गले लगे ! इससे वास्तविक प्रेम का विकास होगा ! बेटे बेटियाँ माता - पिता में ईश्वरीय अंश को देखे . बच्चे-बच्चियां माता - पिता का तिलक पुष्प आदि के द्वारा पूजन करे ! माता - पिता भी बच्चों को तिलक करे आशीर्वचन कहे !
बालक गणेश की पृथ्वी परिक्रमा , भक्त पुन्दालिक की मात्र - पितृ भक्ति , श्रवण कुमार की मात्र - पितृ भक्ति इन कथाओं का पठन करे अथवा कोई एक व्यक्ति कथा सुनाये और अन्य लोग श्रवण करे !
इस दिन बच्चे-बच्चियां पवित्र संकल्प करे : "मैं अपने माता - पिता और गुरुजनों का आदर करूँगा / करुँगी ! मेरे जीवन को महानता के रास्ते ले जाने वाली उनकी आज्ञाओं का पालन करना मेरा कर्त्यव्य है और मैं उसे अवश्य पूरा करुँगी / करूँगा ! नारायण नारायण नारायण , ॐ ॐ ॐ "
माता - पिता 'बाल संस्कार युवाधन सुरक्षा ' , 'तू गुलाब होकर महक ' , 'मधुर व्यवहार ' , इन पुस्तकों को अपने क्षमातानुरूप बांटे बंटवाये तथा तथा प्रतिदिन स्वयं पढ़ने का व बच्चों से पढ़ने का संकल्प लें !
मात - पिता प्रभु गुरु चरणों में प्रणवत बारम्बार , हम पर किया बड़ा उपकार ........
भूलो सभी को तुम मगर माँ - बाप को भूलना नही ........
Friday, February 01, 2008
- परम पूज्य लीलाशाहजी महाराज
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जो ज्ञानयुक्त सेवा करता है वहा अवश्य सफल होता है रोज सुबह नींद में से उठके प्रभु की प्रीति पाने का शुभ संकल्प करो, अपने स्वास्थ्य की समस्याओं का समाधान खोजो और निर्णय करो की दो को हँसाऊँगा, दो के आंसू पोछूँगा
- परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू
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Wednesday, January 30, 2008
शराबी समझता है की मैं शराब पीता हूँ। वास्तव में शराब उसे पी लेती है। बीडी पीने वाले को बीडी पी लेती है। बीडी पीने से ६४ बीमारियों की नींव पड़ जाती है. सुबह को जो खाली पेट चाय पीते है उनका वीर्य कमजोर हो जाता है । ओज नष्ट हो जाता है।
हल्के खान पान और हल्के विचारो से भी बचना है । हल्के संग से भी बचना है। कोई आदमी गरीब है , उसका संग करना हल्का नहीं है । जो तुच्छ चीजे पाकर, भोगी जीवन जीकर अपने को भाग्यवान मानते है उनका संग हल्का संग है । एसे लोगो की बुद्धि तो हल्की है ही ऐसे लोगो को जो बड़ा मानता है उन पर ज्यादा दया आती है । जिसके पास अधिक सुविधा है वह बड़ा नहीं है। बड़ा आदमी तो वह है जो बिना सुविधा के भी आनंदित रह सकता है, प्रसन्न रह सकता है।
दिले तस्वीरे है यार जबकि गर्दन झुका ली और मुलाकात कर ली ।
(आश्रम की समता साम्राज्य पुस्तक से)
श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे : किसी सुन्दर स्त्री पर नजर पड़ जाये तो उसमे माँ जगदम्बा के दर्शन करो । ऐसा विचार करो की यह अवश्य देवी का अवतार है , तभी तो इसमें इतना सौन्दर्य है। माँ प्रसन्न होकर इस रूप में दर्शन दे रही है , ऐसा समझकर सामने खड़ी स्त्री को मन ही मन ही मन प्रणाम करो . इससे तुम्हारे भीतर काम विकार नहीं उठ सकेगा। पराई स्त्री को माता के समान और पराए धन को मिटटी के धेले के समान जानो ।
(आश्रम की यौवन सुरक्षा पुस्तक से )
जैसे बीज की साधना वृक्ष होने के सिवाय और कुछ नहीं, उसी प्रकार जीव की साधना आत्मस्वरूप को जानने के सिवाय और कुछ नहीं। तुम्हारे जीवन में जितना संयम और वाणी में जितनी सच्चाई होगी, उनती ही तुम्हारी और तुम जिससे बात करते हो उसकी आद्यात्मिक उन्नति होगी। अपने दोषों को खोजो। जो अपने दोष देख सकता है , वह कभी न कभी उन दोषों को दूर करने के लिए भी प्रयत्नशील होगा ही। एसे मनुष्य की उन्नति निश्चित है ।
(आश्रम की अमृत के घूँट पुस्तक से )
Tuesday, January 29, 2008
सदाचार निर्भयता की कुंजी है ।
धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः
धन्या च वसुधा देवी यत्र स्याद गुरुभक्तता ॥
हे पार्वती ! जिसके अन्दर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में, जन्म लेनेवाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है
'गीता'
विवेकरूपी वृक्षों का एक अपूर्व बगीचा है यह सब सुखों की नींव है सिद्धान्त-रत्नों का भण्डार है नवरसरूपी अमृत से भरा हुआ समुद्र है खुला हुआ परम धाम है और सब विद्याओं की मूल भूमि है
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एक साधक भाई द्वारा संकलित । साधोवाद ....
Wednesday, January 23, 2008
सदगुरुदेव ने महिलाओं कि तमाम समस्याओ के लिए ये उपाय बताया और जरा जरा बातो मे डरने की आवश्यकता नही और ऑपरेशन भी नही करे ऐसा भी कहा है..
लेडीज की प्रोब्लेम्स(मासिक धर्म कि समस्याये) के लिए उपाय:-
गुरुदेव ने कहा कि देवियों को मासिक धर्म कि प्रोब्लेम हो तो पैन किलर /इंजेक्शन न लें, बहुत नुकसान करते हैं…कोई भी स्त्रियों की गुप्त बिमारी हो, रात को पानी रख लो सवा लीटर, ताम्बे का बरतन हो तो ठीक है, नहीं तो किसी में, सवेरे मंजन कर के, ब्रश करने से फायदा नहीं होता, मंजन करना चाहिऐ, मैं (गुरुदेव) भी मंजन करता हूँ…मंजन करके तुलसी के ५ पत्ते खा लिए…लेकिन रविवार को तुलसी नहीं खाना, नहीं तोडना…
५ पत्ते खा लिए और पानी पी लिया…वैसे तो सूरज उगने पर ही पानी पीना चाहिऐ, रात्री को पानी पीना जठरा मन्द करता है…रात्री को देर भोजन करना बिमारी लाता है॥और दिन में भोजन कर के सोना बिमारी लाएगा…यह बातें समझ लो तो आप निरोग रह सकते हो…तो वोह पानी पी लिया सवा लीटर, थोडा घूमे फिरे, ८ दिन के अन्दर कब्जियात की बिमारी, पेट साफ नहीं आता तो साफ आने लगेगा…मासिक में पीड़ा होती है तो पीड़ा मिट जाएगा, जादा/कम आता है तो ठीक हो जाएगा…नहीं आता है, संतान नहीं होती है…आने लगेगा, और संतान का मंत्र भी दे देंगे, संतान भी हो जायेगी…ऐसे लोग थे डॉक्टर बोलते थे संतान नहीं होगी, ऐसे लोगों के घर में अभी ३-३ संतानें खेल रही हैं…
नारायण हरि
पूज्य श्री बापू जी ने दिनांक २१ जनवरी २००८ को रामलीला मैदान , अजमेरी गेट , दिल्ली के सत्संग में धर्म की पाँच शाखाओं के बारे में विस्तार से बताया । उसके कुछ अंश :
bhagavan ne gita ke 3 re adhyay ka 35 va shlok
shreyanswadharmo viguna: pardharmatswanusthitat l
swadharme nidhanam shreya paradharmo bhayawaha: ll
dharm ki 5 shakhaye hoti hai …
1)swa-dharm
2)par dharm
3)aabhas dharm
4)upama dharm
5)chhal dharam
chhal dharm :- kuchh log dikhave ke liye, shradha nahi lekin aarati kar rahe ..patni kar rahi.. ” mai bhi kar raha hun maharaj “.. aap ko dandavat kiye.. “mai bhi samiti mey hun..” isko bolate chhal dharam..aise rushi parsad ki sewa be-imani se kare to isase nahi karo to achha hai ..jo imandar hai un ko aanand aayega.. rushi prasad ke members ki 16 tarikh ko baithak thi..mai nahi jata kabhi..lekin is baar socha chalo baith jate….to ek advocate bole ,” meri membership chhin li gayi hai, mera kuchh bhi aparadh nahi tha..aparadh naa ho aur phir bhi sewa nikal li gayi , aur wo bhi advocate ki…. to pata chala ki inhone membarship to nibhayi hai,lekin usaka paisa dusari jagah laga diye.. ye chhal-dharm ho gaya na advocate sahab ..usaka nam nahi leta..usaki badanami nahi karunga..
aabhas dharm :- makar sankranti ka ddan dena hai, ekadashi ka daan dena hai to apane hi ghar ke kaamwale ko , nokaro ko de diya …ekadashi ko , navaratri ko 12 kanya ko khana khilana hai to apane beti ki kanya rishtedaro ko bulaaya ye dharm aabhaas dharm hai ..jo dharm ka kewal aabhaas denewala hai isliye is ko “abhas dharm” kahate hai…
upama dharm :- bina dekhe , bina soche ..usane kiya to apana bhi karo..phir ye karane se kya phal hai ye bhi nahi sochate… dikhaavati.. ‘hum bade tapasvi hai, paidal nange pair jaate’.. jaise kayi log nange pair chalate, to apan bhi chale..pahala jamana tha..log nange pair paidal yatra karate..wo jamana alag tha..tub hariyali thi, to aalhad milata nange pair chalane , thakan bhi nahi lagati.. vinoba bhave bolate ki , “ham bhi upama dharm mey phisal gaye the.. parinam pairo ko phaphule..dambar ki sadak hoti hai ..aankhe kharab ho gayi.. “
Thursday, December 13, 2007
श्री सुरेशानंद जी द्वारा भाव पूर्ण पूज्य बापू जी के प्रति व्याख्या
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरं
उनके अधर (होंठ) मधुर हैं, शब्द मधुर हैं, मानो शब्दों की माला हो, उनके मुख से प्रसन्नता झलकती है और हमें भी प्रसन्न करती है! उनके नेत्रों से करुना बरसती है, प्रेम बरसता है! सांसारिक आदमी तो विकारी दृष्टि से देखता है पर गुरुदेव ब्रह्मभाव से देखते हैं! उनका ह्रदय भी मधुर, उनके ह्रदय मे भी मधुरता है!
वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरं,
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं !!
उनके वचन मधुर, उनका चरित्र मधुर, वस्त्र मधुर ! बापूजी के वस्त्रों की श्वेतिमा हमें ह्रदय की श्वेतिमा की प्रेरणा देती है ! ह्रदय की श्वेतिमा, सादगी की प्रेरणा ! वे किसी को प्रभावित नहीं करना चाहते परन्तु प्रकाशित करना चाहते हैं !
वेणु मधुरो रेणू मधुरो पाणी मधुरः पादौ मधुरो
नृत्यं मधुर सख्यं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं !!
वेणु का एक अर्थ है श्री कृष्ण जो बंसी बजाते हैं वो मधुर है ! गुरुदेव की वाणी मधुर है ! रेणू यानी गुरु की चरण रज वो भी मधुर है ! नृत्य भी मधुर है ! बापूजी जब जाते वक्त नृत्य करके जाते हैं तो ऐसा लगता है साक्षात् चैतन्य महाप्रभु हैं ! उन्हें ऐसे देखकर तो जीवनभर जिसने नृत्य न किया हो वो भी खुशी से नृत्य करने लगे !
गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुक्तम मधुरं
रूपम मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं!!
उनके जो गीत हैं जो कीर्तन है वो भी मधुर है उनका रूप मधुर है हमें शान्ति और आनंद प्रदान करता है उनका दर्शन ! उनका तिलक भी मधुर है हमारे गुरुदेव मधुर ही मधुर हैं !!
एक साधक भाई के सहयोग से ......
Tuesday, December 04, 2007
तुमने ही दया करके , बिगड़े काज बनाये ।
तुम दाता हो दयालु , सबके ही काम आए ॥
मेरी चपल गति को , गुरुवर विराम दे दो
सब वासना मिटा कर , अपना ही ध्यान दे दो
मेरा मन मेरे ही , वश में नाही आए
तुमने ही दया करके , बिगड़े काज बनाये ।
प्रभु प्रीत का ये मीठा , अनुभव हुआ है प्यारा
बेकार जाता जीवन , तुमने प्रभु संवारा
अन्तर का तम मिटाकर , जगमग ज्योत जगाये
तुमने ही दया करके , बिगड़े काज बनाये ।
हरि नाम का खजाना , भीतर दिखा रहे हो
जिसे ढूंढते हैं बाहर , ख़ुद में बता रहे हो
बिन सदगुरु के बन्दे , इसको ना साध पाये
तुमने ही दया करके , बिगड़े काज बनाये ।
तेरे दरश का प्यासा , मनवा ये रो रहा है
कैसे संभालूँ इसको , सुध अपनी खो रहा है
नैनों से बहते मोती , छुपते नहीं छुपाये
तुमने ही दया करके , बिगड़े काज बनाये ।
"शुभ" दोनों हाथ फैले , बापू तुम्हारे आगे
नश्वर की नाही इच्छा , भक्ति प्रभु की मांगे
ऐसी अवस्था ला दो , हम ब्रह्मज्ञान पायें
तुमने ही दया करके , बिगड़े काज बनाये ।
मेरी हैसियत ही क्या थी , जो तुम ना साथ होते
जीवन ये जा रहा था , कभी हँसते कभी रोते
समता के पाठ तुमने , अदभुत दिए सिखाये
तुमने ही दया करके , बिगड़े काज बनाये ।
रचित द्वारा : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
९९९०३४८६६४
Wednesday, November 14, 2007
गुरु चरण रज शीश धरी , हृदय रूप विचार ।
श्री आसारामायण कहों , वेदान्त को सार ॥
धर्म कामार्थ मोक्ष दे , रोग शोक संहार ।
भजे जो भक्ति भाव से , शीघ्र हो बेडा पार ॥
भारत सिंधु नदी बखानी , नवाब जिले में गाँव बेराणी
रहता एक सेठ गुनखानी , नाम थाउमल सिरुमलानी
आज्ञा में रहती मेंह्गीबा , पति परायण नाम मंगीबा
चैत वद छः उन्नीस अठानवे , आसुमल अवतरित आँगने
माँ मन में उमडा सुख सागर , द्वार पे आया एक सौदागर
लाया एक अति सुन्दर झूला , देख पिता मन हर्ष से फूला
सभी चकित ईश्वर की माया , उचित समय पर कैसे आया
ईश्वर की यह लीला भारी , बालक है कोई चमत्कारी
संत सेवा और श्रुति श्रवण , मात पिता उपकारी ।
धर्म पुरुष जन्मा कोई , पुण्यों का फल भारी ॥
सूरत थी बालक की सलोनी, आते ही कर दी अनहोनी
समाज में थी मान्यता जैसी , प्रचलित एक कहावत ऐसी
तीन बहन के बाद जो , आता पुत्र वह त्रेखन कहलाता
होता अशुभ अमंगल कारी , दरिद्रता लाता है भारी
विपरीत किन्तु दिया दिखाई , घर में जैसे लक्ष्मी आई
तिरलोकी का आसन डोला , कुबेर ने भण्डार ही खोला
मान प्रतिष्ठा और बढाई , सब के मन सुख शांति छाई
तेजोमय बालक बढा , आनंद बढा अपार ।
शील शांति का आत्मधन , करने लगा विस्तार ॥
एक दिना थाउमल द्वारे , कुलगुरु परशुराम पधारे
ज्यूँ ही वे बालक को निहारे , अनायास ही सहसा पुकारे
यह नहीं बालक साधारण , दैवी लक्षण तेज हैं कारण
नेत्रों में है सात्विक लक्षण , इसके कार्य बडे विलक्षण
यह तो महान संत बनेगा , लोगों का उद्धार करेगा
सुनी गुरु की भविष्य वाणी , गद गद हो गए सिरुमलानी
माता ने भी माथा चूमा , हर कोई ले करके घूमा
ज्ञानी वैरागी पूर्व का , तेरे घर में आये ।
जन्म लिया है योगी ने , पुत्र तेरा कहलाये ॥
पावन तेरा कुल हुआ , जननी कोख कृतार्थ ।
नाम अमर तेरा हुआ , पूर्ण चार पुरुषार्थ ॥
सैतालिस में देश विभाजन , पाक में छोडा भू पशु औ धन
भारत अमदाबाद में आये , मणिनगर में शिक्षा पाए
बड़ी विलक्षण स्मरण शक्ति , असुमल की आशु युक्ति
तीव्र बुद्धि एकाग्र नम्रता , त्वरित कार्य और सहनशीलता
आसुमल प्रसन्न मुख रहते , शिक्षक हसमुख भाई कहते
पिस्ता बादाम काजू अखरोट , भरे जेब खाते भर पेटा
दे दे मक्खन मिश्री कूजा , माँ ने सिखाया ध्यान और पूजा
ध्यान का स्वाद लगा तब ऐसे , रहे न मछली जल बिन जैसे
हुए ब्रह्मविद्या से युक्त वे , वही है विद्या या विमुक्तये
बहुत रात तक पैर दबाते , भरे कंठ पितु आशीष पाते
पुत्र तुम्हारा जगत में , सदा रहेगा नाम ।
लोगों के तुमसे सदा , पूरन होंगे काम ॥
सिर से हटी पिता की छाया , तब माया ने जाल फैलाया
बडे भाई का हुआ दुसाशन , व्यर्थ हुए माँ के आश्वासन
छूटा वैभव स्कूली शिक्षा , शुरू हो गई अग्नि परीक्षा
गए सिद्धपुर नौकरी करने , कृष्ण के आगे बहाए झरने
सेवक सखा भाव से भीजे , गोविन्द माधव तब रीझे
एक दिना एक माई आई , बोली हे भगवन सुखदायी
पड़े पुत्र दुख मुझे झेलने , खून केस दो बेटे जेल में
बोले आसु सुख पावेंगे , निर्दोष छुट जल्दी आवेंगे
बेटे घर आये माँ भागी , आसुमल के पावों लगी
आसुमल का पुष्ट हुआ , आलोकिक प्रभाव ।
वाक सिद्धि की शक्ति का , हो गया प्रादुर्भाव ॥
बरस सिद्धपुर तीन बिताये , लौट अहमदाबाद में आये
करने लगी लक्ष्मी नर्तन , किया भाई का दिल परिवर्तन
दरिद्रता को दूर कर दिया , घर वैभव भरपूर कर दिया
सिनेमा उन्हें कभी न भाये , बलात ले गए रोते आये
जिस माँ ने था ध्यान सिखाया , उसको ही अब रोना आया
माँ करना चाहती थी शादी , आसुमल का मन वैरागी
फिर भी सबने शक्ति लगाई , जबरन कर दी उनकी सगाई
शादी को जब हुआ उनका मन , आसुमल कर गए पलायन
पंडित कहा गुरु समर्थ को , रामदास सावधान ।
शादी फेरे फिरते हुए , भागे छुडा कर जान ॥
करत खोज में निकल गया दम , मिले भरुच में अशोक आश्रम
कठिनाई से मिला रास्ता , प्रतिष्ठा का दिया वास्ता
घर में लाये आजमाये गुर , बारात ले पहुंचे आदिपुर
विवाह हुआ पर मन द्रढाया , भगत ने पत्नी को समझाया
अपना व्यवहार होगा ऐसे , जल में कमल रहता है जैसे
सांसारिक व्यवहार तब होगा , जब मुझे साक्षात्कार होगा
साथ रहे ज्यूँ आत्मा काया , साथ रहे वैरागी माया
अनश्वर हूँ मैं जानता , सत-चित हूँ आनंद ।
स्थिति में जीने लगूँ , होवे परमानन्द ॥
मूल ग्रंथ अध्ययन के हेतु , संस्कृत भाषा है एक सेतु
संस्कृत की शिक्षा पायी , गति और साधना बढाई
एक श्ळोक ह्रदय में पैठा , वैराग्य सोया उठ बैठा
आशा छोड़ नैराश्यवलम्बित , उनकी शिक्षा पूर्ण अनुष्ठित
लक्ष्मी देवी को समझाया , ईश प्राप्ति ध्येय बताया
छोड़ के घर मैं अब जाऊँगा , लक्ष्य प्राप्त कर लौट आऊँगा
केदारनाथ के दर्शन पाए , लक्षाधिपति आशीष पाए
पुनि पूजा पुनः संकल्पाये , ईश प्राप्ति आशीष पाए
आये कृष्ण लीला स्थली में , वृन्दावन की कुञ्ज गलिन में
कृष्ण ने मन में ऐसा ढाला , वे जा पहुंचे नैनिताला
वहाँ थे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठित , स्वामी लीलाशाह प्रतिष्टित
भीतर तरल थे बाहर कठोरा , निर्विकल्प ज्यूँ कागज़ कोरा
पूर्ण स्वतंत्र परम उपकारी , ब्रह्मस्थित आत्मसाक्षात्कारी
ईश-कृपा बिन गुरु नहीं गुरु बिना नहीं ज्ञान ।
ज्ञान बिना आत्मा नहीं गावहि वेद-पुराण ॥
जानने को साधक की कोटी , सत्तर दिन तक हुई कसौटी
कंचन को अग्नि में तपाया , गुरु ने आसुमल बुलवाया
कहा गृहस्थ हो कर्म करना , ध्यान भजन घर पर ही करना
आज्ञा मानी घर पर आये , पक्ष में मोटी-कोरल धाए
नर्मदा तट पर ध्यान लगाए , लालजी महाराज आकर्षाये
सप्रेम शील स्वामी पँह धाए , दत्त-कुटीर में साग्रह लाये
उमडा प्रभु प्रेम का चस्का , अनुष्ठान चालीस दिवस का
मरे छः शत्रु स्थिति पायी , ब्रह्मनिष्ठ्ता सहज समाई
शुभाशुभ सम रोना-गाना , ग्रीष्म ठंड मान और अपमाना
तृप्त हो खाना भूख अरु प्यास , महल और कुटिया आस निरास
भक्ति योग ज्ञान अभ्यासी , हुए समान मगहर और कासी
भाव ही कारण ईश है , न स्वर्ण काठ पाषाण ।
सत-चित-आनंद रूप है , व्यापक है भगवान ॥
ब्रह्मेशान जनार्दन , सारद शेष गणेश ।
निराकार साकार है , है सर्वत्र भवेश ॥
हुए आसुमल ब्रह्म-अभ्यासी , जन्म अनेको लागे बासी
दूर हो गयी आधि व्याधि , सिद्ध हो गयी सहज समाधि
इक रात नदी तट मन आकर्षा , आई जोर से आंधी वर्षा
बंद मकान बरामदा खाली , बैठे वहीं समाधि लगा ली
देखा किसी ने सोचा डाकू , लाये लाठी भाला चाकू
दौडे चीखे शोर मच गया , टूटी समाधि ध्यान खिंच गया
साधक उठा थे बिखरे केशा , राग द्वेष ना किंचित लेशा
सरल लोगों ने साधू माना , हत्यारों ने काल ही जाना
भैरव देख दुष्ट घबराए , पहलवान ज्यूँ मल्ल ही पाए
कामी जनों ने आशिक माना , साधुजन कीन्हें परनामा
एक दृष्टि देखे सभी चले शांत गंभीर ।
सशस्त्रों की भीड़ को सहज गए वे चीर ॥
माता आई धर्म की सेवी , साथ में पत्नी लक्ष्मी देवी
दोनों फूट-फूट के रोई , रुदन देख करुना भी रोई
संत लालजी हृदय पसीजा , हर दर्शक आंसू में भीजा
कहा सभी ने आप जइयो , आसुमल बोले की भाइयों
चालीस दिवस हुआ नही पूरा , अनुष्ठान है मेरा अधूरा
आसुमल ने छोडी तितिक्षा , माँ पत्नी ने की प्रतीक्षा
जिस दिन गाँव से हुई विदाई जार जार रोए लोग लुगाई
अहमदाबाद को हुए रवाना , मिया-गाँव से किया पयाना
मुम्बई गए गुरु की चाह , मिले वहीं पे लीलाशाह
परम पिता ने पुत्र को देखा , सूर्य ने घट जल में पेखा
घटक तोड़ जल जल में मिलाया , जल प्रकाश आकाश में छाया
निज स्वरूप का ज्ञान द्रढाया , ढाई दिवस होश न आया
आसोज सुद दो दिवस , संवत बीस इक्कीस ।
मध्यान्ह ढाई बजे , मिला ईश से ईश ॥
देह सभी मिथ्या हुई जगत हुआ निस्सार ।
हुआ आत्मा से तभी अपना साक्षात्कार ॥
परम स्वतंत्र पुरुष दर्शाया , जीव गया और शिव को पाया
जान लिया हूँ शांत निरंजन , लागू मुझे न कोई बन्धन
यह जगत सारा है नश्वर , मैं ही शाश्वत एक अनश्वर
दीद है दो पर दृष्टि एक है , लघु गुरु में वही एक है
सर्वत्र एक किसे बतलाये , सर्व व्याप्त कहाँ आये जाये
अनंत शक्तिवाला अविनाशी, रिद्धि सिद्धि उसकी दासी
सारा ही ब्रह्माण्ड पसारा , चले उसकी इच्छा अनुसारा
यदि वह संकल्प चलाये , मुर्दा भी जीवित हो जाये
ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर , कार्य रहे न शेष ।
मोह कभी न ठग सके , इच्छा नहीं लवलेश ॥
पूर्ण गुरु कृपा मिली , पूर्ण गुरु का ज्ञान ।
आसुमल से हो गए , साई आसाराम ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति चेते , ब्रह्मानंद का आनंद लेते
खाते पीते मौन या कहते , ब्रह्मानंद मस्ती में रहते
रहो गृहस्थ गुरु का आदेश , गृहस्थ साधु करो उपदेश
किये गुरु ने वारे न्यारे , गुजरात डीसा गाँव पधारे
मृत गाय दिया जीवन दाना , तब से लोगों ने पहचाना
द्वार पे कहते नारायण हरि , लेने जाते कभी मधुकरी
तब से वे सत्संग सुनाते , सभी आरती शांति पाते
जो आया उद्धार कर दिया , भक्त का बेडा पार कर दिया
कितने मरणासन्न जिलाए , व्यसन मांस और मद्य छुडाये
एक दिन मन उकता गया , किया डीसा से कूच ।
आई मौज फकीर की , दिया झोपड़ा फूँक ॥
वे नारेश्वर धाम पधारे , जा पहुंचे नर्मदा किनारे
मीलों पीछे छोडा मंदिर , गए घोर जंगल के अन्दर
घने वृक्ष तले पत्थर पर , बैठे ध्यान निरंजन का धर
रात गयी प्रभात हो आई बाल रवि ने सूरत दिखाई
प्रातः पक्षी कोयल कूकंता , छूटा ध्यान उठे तब संता
प्रातर्विधि निवृत हो आये , तब आभास क्षुधा का पाए
सोचा मैं न कहीं जाऊँगा , यहीं बैठ कर अब खाऊँगा
जिसको गरज होगी आएगा सृष्टि कर्ता खुद लाएगा
ज्यूँ ही मन विचार वे लाये , त्यों ही दो किसान वहाँ आये
दोनों सिर पर बांधे साफा , खाद्य पेय लिए दोनों हाथा
बोले जीवन सफल है आज , अर्घ्य स्वीकारो महाराज
बोले संत और पे जाओ जो है तुम्हारा उसे खिलाओ
बोले किसान आपको देखा , स्वप्न में मार्ग रात को देखा
हमारा न कोई संत है दूजा , आओ गाँव करें तुमरी पूजा
आसाराम तब मन में धारे , निराकार आधार हमारे
पिया दूध थोडा फल खाया , नदी किनारे जोगी धाय
गांधीनगर गुजरात में , है मोटेरा ग्राम ।
ब्रह्मनिष्ठ श्री संत का , यहीं है पावन धाम ॥
आत्मानंद में मस्त है , करे वेदान्ती खेल ।
भक्ति योग और ज्ञान का , सदगुरु करते मेल ॥
साधिकाओं का अलग , आश्रम नारी उत्थान ।
नारी शक्ति जागृत सदा , जिसका नहीं बयान ॥
बालक वृद्ध और नर नारी , सभी प्रेरणा पाए भारी
एक बार जो दर्शन पाए , शांति का अनुभव हो जाये
नित्य विविध प्रयोग कराये , नादानुसंधान बताये
नाभि से वे ओम कहलायें , हृदय से वे राम कहलायें
सामान्य ध्यान जो लगाये , उन्हें वे गहरे में ले जायें
सबको निर्भय योग सिखाएं , सबका आत्मोत्थान करायें
हजारों के रोग मिटाए , और लाखों के शोक छुडाये
अमृतमय प्रसाद जब देते , भक्त का रोग शोक हर लेते
जिसने नाम का दान लिया है , गुरु अमृत का पान किया है
उनका योग क्षेम वे रखते , वे न तीन तापों से तपते
धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते , आपद रोगों से बच जाते
सभी शिष्य रक्षा पाते हैं , सूक्ष्म शरीर गुरु आते हैं
सचमुच गुरु हैं दीन दयाल , सहज ही कर देते हैं निहाल
वे चाहते सब झोली भर ले , निज आत्मा का दर्शन कर लें
एक सौ आठ जो पाठ करेंगे , उनके सारे काज सरेंगे
गंगाराम शील है दासा , होंगी पूर्ण सभी अभिलाषा
वराभयदाता सदगुरु , परम ही भक्त कृपाल ।
निश्चल प्रेम से जो भजे , साँई करे निहाल ॥
मन में नाम तेरा रहे , मुख पे रहे सुगीत ।
हमको इतना दीजिये , रहे चरण में प्रीत ॥
तुमने ही दया करके बिगड़े काज बनाये
तुम दाता हो दयालु सबके ही काम आए
मैं जब भी कभी भटका , तेरी राह से गुरुवर
मेरी बांह खींच लाये , मुझे छोडा अपने दर पर
इतनी दया की फिर भी , तुमको समझ ना पाये
तुमने ही दया करके बिगड़े काज बनाये
कुछ मांगने की चाहत , मेरे दिल में अब नहीं है
जो कुछ किया जो करते , सरकार सब सही है
जितना मिला जो तुमसे , वो ही संभल ना पाये
तुमने ही दया करके बिगड़े काज बनाये
फिर भी जो देना चाहो , सरकार प्यार देना
चरणों की अपने भक्ति , दिन रात मुझको देना
भूलूं तुम्हें कभी ना , चाहे जन्म सौ - सौ आयें
तुमने ही दया करके बिगड़े काज बनाये
"शुभ" दास की है विनती , छूटे ना दर तुम्हारा
चरणों का आसरा दो , बन जाऊं तुमको प्यारा
छूटे ना तेरा दामन , चाहे कोई इसे छुड़ाये
तुमने ही दया करके बिगड़े काज बनाये
रचित द्वारा : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
९९९०३४८६६४
Monday, October 22, 2007
Wednesday, October 17, 2007
Tuesday, October 09, 2007
दिनांक : १३ अक्तूबर २००७
"आसोज सुद दो दिवस , संवत बीस इक्कीस ।
मध्याह्न ढाई बजे , मिला ईश से ईश ॥
देह सभी मिथ्या हुई , जगत हुआ निस्सार ।
हुआ आत्म से तभी अपना साक्षात्कार ॥"
"पूर्ण गुरू कृपा मिली , पूर्ण गुरू का ज्ञान ।
आसुमल से हो गए , साई आसाराम ॥"
सभी गुरू भक्तों को इस पर्व की ख़ूब - ख़ूब बधाई हो ।
नारायण हरि .....
Monday, October 08, 2007
गुरू ब्रह्म ज्ञानी पद पायें , घट में ईश्वर प्रगटायें ।
गुरू कृपा से संशय मिटायें , घट में ईश्वर प्रगटायें ॥
दिवस आज का बहुत ही सुन्दर , अनुभव विचित्र हुए थे अन्दर
साई लीलाशाह को ध्याये , घट में ईश्वर प्रगटायें
गुरू कृपा से संशय मिटायें , घट में ईश्वर प्रगटायें ॥
अंतर ज्योत जगा देते हैं , मन का भरम मिटा देते हैं
खुद ईश्वर धरा पर धाए , घट में ईश्वर प्रगटायें
गुरू कृपा से संशय मिटायें , घट में ईश्वर प्रगटायें ॥
सतगुरु सृष्टि के पालनहारे , सब विधि बिगडे काज सँवारे
घट अनहद नाद सुनाएँ , घट में ईश्वर प्रगटायें
गुरू कृपा से संशय मिटायें , घट में ईश्वर प्रगटायें ॥
ब्रह्मज्ञान का दीप जलाया , कलिकलुष अन्धकार मिटाया
सब ज्योतिर्मय चमकायें , घट में ईश्वर प्रगटायें
गुरू कृपा से संशय मिटायें , घट में ईश्वर प्रगटायें ॥
भक्त जनन के तारनहारे , हम सबके हे बापू प्यारे
"शुभ" चरणों में शीश झुकायें , घट में ईश्वर प्रगटायें
गुरू कृपा से संशय मिटायें , घट में ईश्वर प्रगटायें ॥
रचित द्वारा : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
९९९०३४८६६४
ॐ : गुरू पूनम का पर्व है आया - भजन : ॐ
गुरू पूनम का पर्व है आया , झूम - झूम कर मन ने गाया ।
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥
साधक झूमें मस्ती में हरि नाम का जाम पिलाया ,
नाचे मनवा लहर - लहर गुरू नाम को तेरे गाया -२
प्यास बुझा जाओ , जल्दी से आ जाओ
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥
दूर रहो बच्चो से बापू अब ये सहा ना जाये ,
कितनी पीडा ना मिलने की ये भी कहा ना जाये -२
मिलन बढ़ा जाओ , "शुभ" दर्शन दे जाओ
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥
अंतर्यामी बापू ने वेदों का मनन कराया ,
लोभ मोह मद मत्सर के फंदो से हमे छुडाया -२
अमृत पिला जाओ , सत्संग सुना जाओ
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥
रचित द्वारा : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
९९९०३४८६६४
Monday, October 01, 2007
Monday, September 24, 2007
दुखों से अगर चोट खायी ना होती ।
तुम्हारी प्रभु याद आयी ना होती ॥
जगाते ना ग़र तुम गुरू ज्ञान द्वारा ।
कभी हमसे कोई भलाई ना होती ॥
कहीँ भी हमें चैन मिलता ना जग में ।
शरण यदि परम शांतिदायी ना होती ॥
सदा बंद रहती ये आँखें ह्रदय की ।
जो अपनी खबर तुमसे पायी ना होती ॥
दयासिंधु तुमको समझ ही ना पाते ।
समय पर जो लज्जा बचाई ना होती ॥
किसी का कहीँ भी नही था ठिकाना ।
तुम्हारे यहाँ जो सुनवाई ना होती ॥
बता दो प्रभु ! तुमको पाऊं मैं कैसे ।
विमुख होके सन्मुख अब आऊँ मैं कैसे ॥
विषय वासनायें निकलती नहीं हैं ।
ये चंचल चपल मन मनाऊँ मैं कैसे ।
कभी सोचता हूँ तुमको रोकर पुकारूं ।
पर ऐसा ह्रदय को बनाऊं मैं कैसे ॥
कठिन मोहमाया में अतिशय भ्रमित हूँ ।
प्रभो ! बिन दया पार पाऊँ मैं कैसे ॥
ह्रदय दिव्य आलोक से जो विमल हो ।
विनय किस तरह तो सुनाऊँ मैं कैसे ॥
दयामय तुम्हीं मुझ "पथिक" को संभालो ।
मैं कितना पतित हूँ दिखाऊँ मैं कैसे ॥
पथिक जी महाराज
Tuesday, September 18, 2007
Thursday, September 13, 2007
बोलो मिल कर सारे बापू के जयकारे
हरि ॐ बोलो प्यारे बापू के दुलारे
मैं तो अपने बापू को चंदन ले आया हूँ ,
तिलक लगाओ सारे बापू के दुलारे
बोलो मिल कर सारे बापू के जयकारे
मैं तो अपने बापू को हार ले आया हूँ ,
पहनाओ मिल कर सारे बापू के दुलारे
बोलो मिल कर सारे बापू के जयकारे
"शुभ" चरणों में जब से शीश झुकाया है ,
खुल गए भाग्य हमारे बापू के दुलारे
बोलो मिल कर सारे बापू के जयकारे
भक्तो का मान रखने बापू यहाँ आएंगे ,
अपनी कृपा का अमृत सबको पिलाएँगे ,
दर्शन करना सारे बापू के दुलारे
बोलो मिल कर सारे बापू के जयकारे
रचित द्वारा : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
९९९०३४८६६४
Wednesday, September 12, 2007
ॐ गं गणपतये नमः(Excerpts from the Satsang of Param Pujya Sant Shri Asaramji Bapu)
Ganesh Chaturthi is celebrated on the birthday of Lord Ganesh (Ganesha), the god of wisdom and prosperity on the fourth day of the moons bright fortnight, or period from new moon in the lunar month of Bhadrapada। The celebration of Ganesh Chaturthi continue for five, seven, or ten days. Some even stretch it to twenty one days, but ten the most popularly celebrated. In the tradition of the right hand path the first day is the most important. In the left hand path tradition the final day is most important.
Though there is a tale for the day that "why looking the moon is harmful this day?". Here it is :
Once Lord Ganesha was walking in His own delightful rhythm। It was the fourth lunar day (chaturthi)। The Moon god saw him। The Moon god was very vain about his good looks। He said with a bitter sarcasm to Lord Ganesha, "What a beautiful form you have! A big belly and an elephant's head...".
Lord Ganesha realized that the Moon's vanity will not go without his being appropriately punished for the same. Lord Ganesha said, "Your face will not be worth showing to anybody."
The Moon did not rise after that. The gods were worried, "The whole department that nourishes the earth has been closed! How will the medicinal herbs be enriched? How will the affairs of the world be conducted?"
Lord Brahma said, "The Moon's insolence has angered Lord Ganesha."
The gods worshipped Lord Ganesha in order to propitiate him. When Lord Ganesha was pleased, the Moon's face became worth showing to others. The Moon god prayed to Lord Ganesha with hymns.
Lord Ganesha said, "Your face will be worth showing on other days of the year, but on the fourth lunar day of the bright fortnight of Bhadrapada, the day when you insulted me, whoever sees you will be slandered with a serious blemish within a year. This is necessary to give the message to the people that 'No one should be vain regarding one's physical beauty and charm.'
The Lord of all the gods and senses is the Self. You are ridiculing a Self-Realized personality like me? You are finding faults with my physical form and are proud of your external beauty? You are ignorant of Me, the Self, the source of all beauty, that lends beauty to your external form. That Self alone exists. He alone is seen in the forms of Lord Narayana, Lord Ganesha, Lord Shiva as also in all beings. O Moon! Even your real Being is That very Self. Don't be proud of your external beauty."
Even the likes of Lord Krishna was accused of stealing the 'Syamantaka Gem', because He happened to see the Moon on that particular fourth lunar day. Even His brother Balrama joined the accusers; though, in fact, Lord Krishna had not stolen the 'Syamantaka Gem'.
Those who don't believe in the truth of this incident, who are sceptical of the scriptures, are invited to test its veracity by looking at the Moon on the fourth lunar day of the bright fortnight of Bhadrapada (Ganesh Chaturthi). A sceptic will pay the cost of disbelieving the scriptures retold in satsang. Within a year, he will be the victim of such a great blemish as will completely vitiate his dignity.
IMPORTANT NOTE:
Ganesh Chaturthi falls this year on Saturday, 15th Sep'07. The Moon will set at 8:45 PM on this day. Take care not to see the Moon till then.
However, if you look at the Moon on the 3rd and 5th nights of that lunar month, the harmful effects caused by seeing the Moon on the 4th lunar night is countered. In any case, if by mistake you do happen to look at the Moon on this night, read or listen to the episode narrating the theft of the Syamantak Mani as described in the 56th and 57th chapters of the tenth Skanda of the Srimad Bhagawata.
Source : with the help of a Guru Bhai
ॐ गं गणपतये नमः
Thursday, September 06, 2007
तुम ईष्ट हो परमात्मा , बापू मेरे मेरी आत्मा ।
मैं दीन हूँ तुम दीनानाथ , भक्तों के रहते हो साथ
सुनकर प्रभु करूण पुकार , धरती पर लीन्ह अवतार
तुम ईष्ट हो परमात्मा , बापू मेरे मेरी आत्मा ।
योगेश्वर धर्म प्रणेता , लोक लाडले ब्रह्मवेत्ता
युग प्रवर्तक ह्रदय विजेता , भाव की माला दास ये देता
तुम ईष्ट हो परमात्मा , बापू मेरे मेरी आत्मा ।
मधुरम तेरी मुस्कान है , शरणं हुआ ये जहान है
गुंजन हुआ "शुभ" गान है , आये धरा पर भगवान है
तुम ईष्ट हो परमात्मा , बापू मेरे मेरी आत्मा ।
हम पर तेरा उपकार है , शरण में आये वो भव पार है
"शुभ" तेरी उपस्थिति है , सर्वोच्च साँई की स्थिति है
तुम ईष्ट हो परमात्मा , बापू मेरे मेरी आत्मा ।
Thursday, August 30, 2007
ॐ ---- श्री कृष्ण जन्माष्टमी की बधाईयाँ ---- ॐ
हर चित्त में बसेरा कर डाला रे गोपाला ,
तू अनेकों नाम रूपों वाला रे गोपाला
गोपाला – गोपाला , नन्द लाला -2
कारागार में जन्म लियो है ,
सृष्टि पर उपकार कियो है ,
तूने खोल दिया हर एक ताला रे गोपाला
तू अनेकों नाम रूपों वाला रे गोपाला
गोपाला – गोपाला , नन्द लाला -2
ग्वाल - बाल संग यमुना किनारे ,
खेलन गयो मोरे कृष्ण मुरारे ,
तूने कालिया मर्दन कर डाला रे गोपाला
तू अनेकों नाम रूपों वाला रे गोपाला
गोपाला – गोपाला , नन्द लाला -2
ज़हर का प्याला राणा जी ने भेजा ,
पिया ज़हर मीरा ने ना सोचा ,
तूने विष को अमृत कर डाला रे गोपाला
तू अनेकों नाम रूपों वाला रे गोपाला
गोपाला – गोपाला , नन्द लाला -2
गोकुल पर जब विपदा पडी थी ,
सबकी निगाहें तुम पे गडी थी ,
तुने गोवर्धन ही उठा डाला रे गोपाला
तू अनेकों नाम रूपों वाला रे गोपाला
गोपाला – गोपाला , नन्द लाला -2
“शुभ” को अपना दास बना लो ,
अन्तः करण में वास बना लो ,
तुझे अर्पण करूँ भाव माला रे गोपाला
तू अनेकों नाम रूपों वाला रे गोपाला
गोपाला – गोपाला , नन्द लाला -2
रचित द्वारा : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
९९९०३४८६६४
Friday, August 17, 2007
Monday, August 13, 2007
प्यारी हमारी गुरू पादुका ज्योत जगाने वाली है ,
महिमा गुरू चरणों की वेदों ने भी बखानी है ।
कृष्ण लला ने गुरू सांदिपनी के चरण पखारे थे ,
तीन लोक के राजा बने सबके ह्रदय दुलारे थे ,
हरि भी गुरू चरणों मे बैठे सत्य है ! नहीं कहानी है ,
महिमा गुरू चरणों की वेदों ने भी बखानी है ।
श्री राम जी को जग पूजे वो पूजे नित गुरू चरनन को ,
गुरू वाशिष्ठ की चरण पादुका रख ली नित - नित दर्शन को ,
मर्यादापुरुषोत्तम बन गए बात सभी ने जानी है ,
महिमा गुरू चरणों की वेदों ने भी बखानी है ।
ऐसे ही हम साधक मिल कर चरण वंदना गाते हैं ,
संत शिरोमणि बापूजी के आशीर्वचन को पाते हैं ,
सुने धरा और नभ के वासी ये "शुभ" वाणी है ,
महिमा गुरू चरणों की वेदों ने भी बखानी है ।
ॐ श्री सतगुरु चरण कमलेभ्यो नमः
रचित द्वारा : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
९९९०३४८६६४
Saturday, August 04, 2007
Friday, July 27, 2007
Pujay Bapu Ji has explained the same several times। I am sorry but I don't remember।
Please answer the following queries।
1) In which days should anyone not take Aaonla Churan?
2) Should a married couple take all Ekadashi fasts in Chaturmas?
3) What precautions one must take while taking food and juice?
4) question regarding sleeping : sleeping on earth or on bed etc।
These are few of general awareness questions. If anyone wish to add answer or query, may continue with this mail.We may refer any ashram publication with page number. For example : Rishi Prasad, issue - 123, month - july, year - 2006, page number : 20-22.The above given detail was for example only.
Narayan Hari
Om tam namami Hari param
Om tam namami Guru param
Om tam namami Guru param
Tuesday, July 24, 2007
Day 2, Date : 22nd July 2007
Pujya Bapu Ji has confirmed and announced the next Poonam Satsang in Faridabad (Haryana). Pujya Shri ordered to all samiti to distribute harad tablets as prasad in own areas as was distributed in Rohini's satsang. The special harad packets(mixture of harad and gud) were distributed in Rohini's satsang also. Pujya Gurudev very much emphesized to take this mixture in these days. It's a remedy of four major problems, i.e. vaat, pitt, cough and amla(aam). The packets shall soon be available on nominal cost on almost all ashrams very soon.
Pujya Bapu ji also taught a new kind of Dhyan. say Hari om.. hari om.. slowly slowly and give motion to your body like from left to right and right to left. Masti mein .. anand mein .. maadhurya mein .. apne ishwaryiya swabhav mein jhoomte jao. Jis prakar been ki awaz sunkar vishdhar bhi apna vishaila swabhav bhoolkar dolne lag jata hai.
Bahut anand aaya tha dhyan karne mein. Koi kasrat nahi karni padi, koi mehnat ka kaam bhi nahi tha.
Narayan Hari.
Friday, July 20, 2007
खोलो दया का द्वार मेरे बापू अब , खोलो दया का द्वार
खोलो दया का द्वार मेरे बापू अब , खोलो दया का द्वार
अंतर्यामी कहलाते हो दया करो मेरे स्वामी -2
बांह पकड़ लो तार दो मुझको -2
नैया पडी मंझदार मेरे बापू अब , खोलो दया का द्वार
खोलो दया का द्वार मेरे बापू अब , खोलो दया का द्वार
गुरू ब्रह्मा गुरू विष्णु कहाते , शिव स्वरूप में तुम प्रग्टाते
ऋषि मुनि ज्ञानी भजते हैं -२
ऐसी महिमा अपार मेरे बापू अब , खोलो दया का द्वार
खोलो दया का द्वार मेरे बापू अब , खोलो दया का द्वार
तेरे नाम से पापी तरते , "शुभ" बालक को देर क्यों करते
अपने स्वरूप का दर्श करा दो -2
कर दो एक उपकार मेरे बापू अब , खोलो दया का द्वार
खोलो दया का द्वार मेरे बापू अब , खोलो दया का द्वार
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नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण
Thursday, July 19, 2007
तेरा किसी ने पार ना पाया हे परमेश्वर जगत पिता
तुमको कोई समझ ना पाया हे परमेश्वर जगत पिता
कभी ज्ञानी तुम कभी ध्यानी तुम , हर घट में ब्रह्मज्ञानी तुम
चर भी तुम अचर भी तुम प्रभु चराचर स्वामी तुम
महिमा तेरी गा ना पाया हे परमेश्वर जगत पिता
तुमको कोई समझ ना पाया हे परमेश्वर जगत पिता
नख से लेकर शिख तक मेरे प्रभु तुम्हारा वास है
चाहे जहाँ भी रहूँ जगत में दिल तुम्हारे पास है
तेरी कृपा से नर तन पाया हे परमेश्वर जगत पिता
तुमको कोई समझ ना पाया हे परमेश्वर जगत पिता
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे में तेरा रुप अनूप है
हर घट तेरी माया साई कहीँ छाया कहीँ धूप है
गुरू रुप में खुद चल आया हे परमेश्वर जगत पिता
तुमको कोई समझ ना पाया हे परमेश्वर जगत पिता
नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण
Wednesday, July 11, 2007
July 13, 2007 (Friday) is astrologically calculated and predicted to be the most beneficial day for spiritual aspirants.
Japa of Pranava mantra ( Aumkar mantra ("ॐ")) on the fourteenth moon night during the Ardra nakshtra(This year 13th July 2007) gives perpetual fruits.(Shiva Purana; Vidyeshwar Sanhita; Chapter 10)
PujyaShri has told Maha Ardra Nakshatra on 13 July 2007 is from Morning 5.00 AM to 07.30 PM Only(IST). (Exact Timings are approx - 05.11 AM to 07.14 PM)
All sadhaks must spend time on this day chanting "ॐ" Mantra .Mantra Jaap should be followed by the recitation of Shri Guru Gita Paath. Light diet and Maun are recommended.
By the blessings of his divine holiness Sai Asaramji Bapu, all are requested to kindly take as much benefit on this day by fasting, observing maun (silence) and chanting the mantra for as long as possible throughout the day. We would also request you to kindly hand over this message by mail, phone or personally to as many as possible. Bapuji has also said that do sankalp on 12th July night and sleep. Next whole day do japa only.
Bapuji has said that any sadhak who wants to give Dakshina, must chant "ॐ" (pranava) . He will get much more than expected. Pujya Bapuji also emphasized that this type of nakshatra rarely comes, so one should take leave from his work and do only japa on this pious day.
"Japaat Siddhi…Japaat Siddhi… Japaat Siddhi….Na Sanshayaa."
Chanting the Mantra will reward you attainment. There is no doubt about this.
Source : Ghaziabad (India) satsang on 30th June and 1st July and Hariomgroup.org






क्रमशः