Saturday, March 06, 2010

********* SRIMAD BHAGVAD GITA (11.44 - 11.46) *********

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं- प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्।।44।।

अतएव हे प्रभो ! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूँ। हे देव ! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं – वैसे ही आप भी मेरे अपराध सहन करने योग्य
हैं।(44)

Therefore, bowing down, prostrating my body, I crave Thy forgiveness, O adorable Lord! As a father forgives his son, a friend his (dear) friend, a lover his beloved, even so shouldst Thou forgive me, O God!

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देवरूपं- प्रसीद देवेश जगन्निवास।।45।।

मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णुरूप को ही मुझे दिखलाइये ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! प्रसन्न होइये।(45)

I am delighted, having seen what has never been seen before; and yet my mind is distressed with fear. Show me that (previous) form only, O God! Have mercy, O God of gods! O abode of the universe!

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते।।46।।

मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किये हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ, इसलिए हे विश्वस्वरूप ! हे सहस्रबाहो ! आप उसी चतुर्भुजरूप से प्रकट होइये।(46)

I desire to see Thee as before, crowned, bearing a mace, with the discus in hand, in Thy former form only, having four arms, O thousand-armed, Cosmic Form (Being)!
गुरु वचन :

ईश्वरीय शक्तियाँ तुम्हारे द्वारा काम करने को तत्पर हैं। तुम क्यों बेईमानी कर रहे हो ? क्यों अपेक्षाएँ कर रहे हो ? क्यों सिकुड़ रहे हो ? क्यों मन के गुलाम बन रहे हो ? मन की कल्पनाओं के पीछे भाग रहे हो ? मारो ॐकार की गदा...। अपेक्षाओं को चूर... चूर कर दो। वासनाओं को कुचल डालो। फिर देखो, क्या रहस्य खुलने लगते हैं !

होली यानी जो हो... ली.... कल तक जो होना था, वह हो लिया। आओ, आज एक नयी जिंदगी की शुरुआत करें। जो दीन-हीन हैं, शोषित है, उपेक्षित है, पीड़ित है, अशिक्षित है, समाज के उस अंतिम व्यक्ति को भी सहारा दें। जिंदगी का क्या भरोसा ! कुछ काम ऐसे कर चलो कि हजारों दिल दुआएँ देते रहें... चल पड़ो उस पथ पर, जिस पर चलकर कुछ दीवाने प्रह्लाद बन गये। करोगे न हिम्मत ! तो उठो और चल पतो उठो और चल पड। तो उठो और चल पड़ो प्रभुप्राप्ति, प्रभुसुख, प्रभुज्ञान, प्रभुआनंद प्राप्ति के पुनीत पथ पर ।

संसार के सुख पाने की इच्छा दोष ले आती है और आत्मसुख पाने की इच्छा सदगुण ले आती है। ऐसा कोई दुर्गुण नहीं जो संसार के भोग की इच्छा से पैदा न हो। व्यक्ति बुद्धिमान हो, लेकिन भोग की इच्छा उसमें दुर्गुण ले आयेगी। चाहे कितना भी बुद्धू हो, लेकिन ईश्वर प्राप्ति की इच्छा उसमें सदगुण ले आएगी।
नारायण .... नारायण

Tuesday, January 05, 2010

HariOm,

The divine services by the ashram with blessings of Pujya Bapuji have been performed for many years regularly। Few of them were captured in camera। Please do visit the following link to get the visual tour of those divine sewa।

http://www.ashram.org/About-Ashram/Activities

Pujya Gurudev teachs us :

"Parhit saris dharam nahi bhai, par-peeda sam nahi adhmai"

निर्धन हो या हो धनवान , समझें सबको एक समान ।
"शुभ" झलक मिल जाए तो -२ , टूट जाते हैं सारे अभिमान ॥

We proud to be the disciple of such great saint। Narayan Hari




Thursday, December 31, 2009

सत्संग लहरियाँ

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जो लोग भीष्ण संग्राम करके, क्रूर नरसंहार करके, बड़े-बड़े युद्ध खेलकर सत्ता की गद्दी पर पहुँच जाते हैं उनका नाम सुनकर उनको याद करके लोग आदर से नतमस्तक नहीं होते लेकिन विश्व में कुछ ऐसे आत्म-विजेता लोग हो जाते हैं, नतमस्तक हो जाते हैं। भीष्म, हरिश्चन्द्र, भरत, शंकराचार्य, महावीर, वल्लभाचार्य, रामानुजाचार्य, मीराबाई, एकनाथजी, शिवाजी महाराज, तोतापुरी, रामकृष्ण आदि ऐसी विभूतियाँ हैं। जिन्होंने अपने मन को, अपनी इन्द्रियों को संयत किया है, जिन्होंने अपने को विकारी सुखों से बचाकर निर्विकारी नारायण सुख का प्रसाद पाया है ऐसे लोग चाहे इस देश के हों चाहे परदेश के हों, उनको समाज ने खूब आदर-मान से याद रखा है। लोगों ने सुकरात को याद रखा है, महात्मा थोरो को लोग याद करते हैं जिसस को लोग याद करते हैं, धन्ना जाट को लोग याद करते हैं, वल्लभाचार्य, रामानुजाचार्य एवं अन्य कई महापुरूषों को, आत्मा-परमात्मा में विश्रान्ति पाये हुए संतों को हम बड़े आदर से याद करते हैं। शबरी भिलनी हो चाहे रोहिदास चमार हो, गार्गी हो चाहे राजा जनक हों, एकनाथजी हों या एकलव्य हो, जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को वश करके मन को परमात्मा में लगाया है या लगाने का दृढ़ प्रयत्न किया है ऐसे लोग जन्म लेकर मर नहीं जाते लेकिन जन्म लेकर अमर आत्मा की ओर चल देते हैं, संसार में अपनी मधुरता, अपनी शुभ कीर्ति छोड़ जाते हैं।


भगवान श्रीकृष्ण भगवद् गीता में अर्जुन से कहते हैं-
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।।

'इन्द्रिय समुदाय को सम्यक प्रकार से नियमित करके सर्वत्र समभाववाले, भूत मात्र के हित में रत वे भक्त मुझ ही को प्राप्त होते हैं।'
(भगवद् गीताः 12.4)
मनुष्य को विकारी आकर्षण ने तुच्छ बना दिया है। जिनके जीवन में संयम है, नियम है ऐसे इन्द्रियों को संयत करने वाले लोग, सब भूतों के हित में रमने वाले लोग, समभाव से मति को सम रखने वाले वे लोग मतिदाता के उच्च अनुभव में स्थिति पा लेते हैं। ऐसे लोग भगवान को प्राप्त कर लें इसमें कुछ आश्चर्य नहीं है। यह कोई जरूरी नहीं है कि वह आदमी अच्छा पढ़ा-लिखा होना चाहिए या अनपढ़ होना चाहिए, बहुत धनवान होना चाहिए या निर्धन होना चाहिए, बच्चा होना चाहिए या जवान होना चाहिए या बूढ़ा होना चाहिए ऐसा कोई नियम नहीं है।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशोऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया।।

'हे अर्जुन ! शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है।'
(भगवद् गीताः 18.61)
भगवान कहते हैं कि सबके हृदय में मैं ज्यों का त्यों विराजमान हूँ। लेकिन सब मयारूपी यंत्र से भ्रमित हो रहे हैं।
माया का अर्थ है धोखा। धोखे के कारण हम दीन-हीन हुए जा रहे हैं। 'हे धन ! तू कृपा कर.... सुख दे। हे कपड़े ! तू सुख दे। हे गहने ! तू सुख दे।'

ब्रह्मलोक में वह सुख नहीं जो ब्रह्म परमात्मा के साक्षात्कार में है।
ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व पाशेभ्यः।
उस देव को जानने से जीव सारे पाशों से, सारी जंजीरों से मुक्त हो जाता है।
मनुष्य जन्म में ऐसी मति मिली है कि इससे वह भूत का, भविष्य का चिन्तन-विचार कर सकता है। पशु तो कुछ समय के बाद अपने माँ-बाप को भी भूल जाते हैं, भाई-बहन को भी भूल जाते है और संसार व्यवहार कर लेते हैं। मनुष्य की मति में स्मृति रहती है।
Ten Steps to a Noble Life
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(Excerpts from Satsang of Pujya Sant Shri Asaramji Bapu)
The key to attain grandeur and excellence in life lies in satisfying the basic needs and eliminating the desires। Man is driven towards action primarily by two factors 'one is fulfilment of desires and the other is provision of needs. When you renounce and eliminate your desires, your life becomes effulgent and basic needs too are spontaneously met.

A life without a proper direction is a burden। It becomes a liability for the family and society. It drives people towards terrorism and violence. It leads to barbarism and depravity. The real goal of life includes peace and salvation, provision of basic needs and elimination of desires. If man does not strive to eliminate his desires, the desires ultimately get the better of him and enslave him.

An aspirant should continuously strive to study the scriptures, reflect on them and determine the right course of action for his spiritual advancement, chiefly through a discriminative attitude towards life। He must observe some select vows and be careful of the pitfalls that lead to spiritual downfall and consequently distance him from God and the Guru. At the same time he must also be aware of actions that may help him get closer to realizing the Divine Being. He should be circumspect and analyse his past with a reflective mind to learn from his mistakes. Also, he should make new resolves in order to make true progress.

Seek the answers to questions like, 'What is the Atma?' What is Paramatma?' What is the nature of the universe?' Who am I?'' The act of understanding the answers to these questions through listening or study of scriptures is called 'Shravana'। After 'Shravana' comes 'Manana' and then 'Nididhyasana'. Finally, 'Nididhyasana' culminates into realization of the Truth. This is the convention of Vedanta.

We take good care of a stone, a piece of iron or any such object that is useful to us। Similarly a devotee, by earnestly discharging his duties, becomes useful to the Lord. He has no desires for the fruits of his actions. Then the Lord Himself takes care of him. People and nature become eager to serve him. Why should such a master of selfless actions desire for anything' He simply adds to his capability by remaining steadfast on the path of righteousness. He is completely detached to the fruits of his actions.

If one performs actions taking care not to harm anyone in any way, then one is actually engaged in worshipping the Lord. One's actions then become Upasana and Yajna. Such a selfless and altruistic aspirant alone is entitled to realize the Lord in His integral Being.
According to the Srimad Bhagwad Gita, real worship is done neither before idols in temples, nor even in the temple of one's mind। The Lord is truly worshipped through selfless actions. Selfless actions, when offered to the Lord, become His real worship.

Is there anything superior to samadhi' The Gita says 'yes'। According to the Gita, 'equanimity' is superior to samadhi. Even after attaining the state of samadhi, one may experience a downfall, a devotee can undergo a change of mind or faith but if an aspirant becomes established in the state of equanimity then he will never fall down from that Supreme state.

You can enhance your powers by propitiating Shakti, the goddess of power। But the realization of True Knowledge bestows eternal peace.

Come beloved aspirants! I hereby invite those with a zeal for material and spiritual advancement! May you earn success! May you be self-restrained! May you be brilliant! May you earn respect and fame for yourself and your ancestors! May you light up your path and be a worthy guide to the descendants of your clan 'may you become such a great person!
Narayan Hari....

Wednesday, December 30, 2009

Madhur Vyavhaar : Winsome Behaviour
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Sweet language spoken for the benefit of others gives them happiness, peace & love; also, it gets back happiness, peace & love for oneself. Such language nourishes ones good qualities and provides mind with pure & positive energy. It is a blessing from God and it is beneficial for us & everybody around us. It protects & beautifies The Truth.
Never speak any word which hurts & harms anybody. Harsh & hurting language cannot hide the truth, and the partial truth present in the harshly spoken statement also gets deformed because it is not appreciated by anybody. The one who has foul tongue has an evil heart.Some scholar told Pandit Madanmohan Malviya: "You can abuse me with hundred harsh words but I'll not get annoyed."The reply that Malviyaji gave reflects his greatness. He said: "I'll test your anger later, before that my tongue will become dirty."Neither should you make your tongue dirty nor should you accept such language from others. If the bad language of others influences your mind, it means that you are accepting their foul language.
Stealing somebody's property, money etc is not as big a crime as hurting other's feelings. Do not break anybody's heart because God Himself lives in his/her heart. If suggestions are given with an attitude of love & respect for the other, then there can never be any conflict in the family.

Monday, December 28, 2009

पुत्रदा/वैकुण्ठएकादशी
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युधिष्ठिर बोले:श्रीकृष्ण ! कृपा करके पौष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का माहात्म्य बतलाइये । उसका नाम क्या है? उसे करने की विधि क्या है ? उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है ?

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा:राजन्! पौष मास के शुक्लपक्ष की जो एकादशी है, उसका नाम ‘पुत्रदा’ है । पुत्रदा एकादशी’ को नाम-मंत्रों का उच्चारण करके फलों के द्वारा श्रीहरि का पूजन करे ।

नारियल के फल, सुपारी, बिजौरा नींबू, जमीरा नींबू, अनार, सुन्दर आँवला, लौंग, बेर तथा विशेषत: आम के फलों से देवदेवेश्वर श्रीहरि की पूजा करनी चाहिए । इसी प्रकार धूप दीप से भी भगवान की अर्चना करे

‘पुत्रदा एकादशी’ को विशेष रुप से दीप दान करने का विधान है । रात को वैष्णव पुरुषों के साथ जागरण करना चाहिए । जागरण करनेवाले को जिस फल की प्राप्ति होति है, वह हजारों वर्ष तक तपस्या करने से भी नहीं मिलता । यह सब पापों को हरनेवाली उत्तम तिथि है ।

चराचर जगतसहित समस्त त्रिलोकी में इससे बढ़कर दूसरी कोई तिथि नहीं है । समस्त कामनाओं तथा सिद्धियों के दाता भगवान नारायण इस तिथि के अधिदेवता हैं । पूर्वकाल की बात है, भद्रावतीपुरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे । उनकी रानी का नाम चम्पा था । राजा को बहुत समय तक कोई वंशधर पुत्र नहीं प्राप्त हुआ । इसलिए दोनों पति पत्नी सदा चिन्ता और शोक में डूबे रहते थे ।
राजा के पितर उनके दिये हुए जल को शोकोच्छ्वास से गरम करके पीते थे । ‘राजा के बाद और कोई ऐसा नहीं दिखायी देता, जो हम लोगों का तर्पण करेगा …’ यह सोच सोचकर पितर दु:खी रहते थे । एक दिन राजा घोड़े पर सवार हो गहन वन में चले गये । पुरोहित आदि किसीको भी इस बात का पता न था । मृग और पक्षियों से सेवित उस सघन कानन में राजा भ्रमण करने लगे । मार्ग में कहीं सियार की बोली सुनायी पड़ती थी तो कहीं उल्लुओं की । जहाँ तहाँ भालू और मृग दृष्टिगोचर हो रहे थे । इस प्रकार घूम घूमकर राजा वन की शोभा देख रहे थे, इतने में दोपहर हो गयी । राजा को भूख और प्यास सताने लगी । वे जल की खोज में इधर उधर भटकने लगे । किसी पुण्य के प्रभाव से उन्हें एक उत्तम सरोवर दिखायी दिया, जिसके समीप मुनियों के बहुत से आश्रम थे । शोभाशाली नरेश ने उन
आश्रमों की ओर देखा ।

उस समय शुभ की सूचना देनेवाले शकुन होने लगे। राजा का दाहिना नेत्र और दाहिना हाथ फड़कने लगा, जो उत्तम फल की सूचना दे रहा था । सरोवर के तट पर बहुत से मुनि वेदपाठ कर रहे थे । उन्हें देखकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ । वे घोड़े से उतरकर मुनियों के सामने खड़े हो गये और पृथक् पृथक् उन सबकी वन्दना करने लगे । वे मुनि उत्तम व्रत का पालन करनेवाले थे । जब राजा ने हाथ जोड़कर बारंबार दण्डवत् किया, तब मुनि बोले : ‘राजन् ! हम लोग तुम पर प्रसन्न हैं।’ राजा बोले:आप लोग कौन हैं ? आपके नाम क्या हैं तथा आप लोग किसलिए यहाँ एकत्रित हुए हैं? कृपया यह सब बताइये ।

मुनि बोले:राजन् ! हम लोग विश्वेदेव हैं । यहाँ स्नान के लिए आये हैं । माघ मास निकट आया है । आज से पाँचवें दिन माघ का स्नान आरम्भ हो जायेगा । आज ही ‘पुत्रदा’ नाम की एकादशी है,जो व्रत करनेवाले मनुष्यों को पुत्र देती है ।
राजा ने कहा:विश्वेदेवगण ! यदि आप लोग प्रसन्न हैं तो मुझे पुत्र दीजिये।
मुनि बोले:राजन्! आज ‘पुत्रदा’ नाम की एकादशी है। इसका व्रत बहुत विख्यात है। तुम आज इस उत्तम व्रत का पालन करो । महाराज! भगवान केशव के प्रसाद से तुम्हें पुत्र अवश्य प्राप्त होगा । भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:युधिष्ठिर ! इस प्रकार उन मुनियों के कहने से राजा ने उक्त उत्तम व्रत का पालन किया । महर्षियों के उपदेश के अनुसार विधिपूर्वक ‘पुत्रदा एकादशी’ का अनुष्ठान किया ।
फिर द्वादशी को पारण करके मुनियों के चरणों में बारंबार मस्तक झुकाकर राजा अपने घर आये । तदनन्तर रानी ने गर्भधारण किया । प्रसवकाल आने पर पुण्यकर्मा राजा को तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ, जिसने अपने गुणों से पिता को संतुष्ट कर दिया । वह प्रजा का पालक हुआ । इसलिए राजन्! ‘पुत्रदा’ का उत्तम व्रत अवश्य करना चाहिए । मैंने लोगों के हित के लिए तुम्हारे सामने इसका वर्णन किया है

जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर ‘पुत्रदा एकादशी’ का व्रत करते हैं, वे इस लोक में पुत्र पाकर मृत्यु के पश्चात् स्वर्गगामी होते हैं। इस माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है ।
ज्ञान के मोती : पूज्य बापू जी के मुखारविंद से बरसी अमृतवाणी
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Jo Guruvachan per dat jate hai unhe hajar vighna-badhaye aye, phir bhi adhyatmik rasta nahi chhodte, Guru me dradh shraddha sansar saagar se paar laga deti hai .

जो गुरु वचनों पर ड़ट जाते है उन्हें हजार विघ्न - बाधायें आये फिर भी आध्यात्मिक रास्ता नही छोडते। गुरु मे दृढ़ श्रद्धा संसार सागर से पार लगा देती हैं।

Aisa nahi hai ki humare pass Anna, Vastra, Rupiye, Makan ya khane ke liye Roti, pahan ne ko Kapde nahi Isliye dukhi hai. Sachchi samajh aur vivek nahi hai isliye dukhi hai

ऐसा नही है कि हमारे पास अन्न, वस्त्र, रुपिये, मकान या खाने के लिये रोटी, पहनने को कपड़े नही इसलिये दुखी है. सच्ची समझ और विवेक नही है इसलिये दुखी हैं।

Yadi aap sachmuch Parmatm-shanti me sthit ho jao to samagra ulta hokar tang jaye fir bhi aapki shanti bhang nahi ho sakti। apni Mahima me jago -
Pujya Bapuji

Friday, June 26, 2009

हरि ॐ...

भगवान को हम क्यों मानें? गुरु को हम क्यों मानें?

किसी न किसी रूप से, किसी न किसी से कुछ न कुछ अनुचित या अपराध हो ही जाता है; चाहे कितना भी धर्मात्मा हो, कितना भी अधिकारी समझदार हो, फिर भी कहीं न कहीं गड़बड़ हो ही जाती है; इसलिए हम भगवान को मानते हैं ताकि हमारी गलती क्षम्य हो जाए;

मेटत कठिन कुअंक भाल के;

भाग्य के कु-अंक मिट जाएँ, भाग्य के कु-अंक मिटाने के लिए भगवान की भक्ति है, भगवान की प्रीती पाने के लिए भगवान की भक्ति है, भगवान में अपना अहम् मिला दो तो भगवान का सौंदर्य, भगवान का सामर्थ्य, और भगवान का रस सहज में प्राप्त हो जाए, इसलिए भगवान की भक्ति की हमें आवश्यकता है

Thursday, May 21, 2009

जोगी रे क्या जादू है तेरे प्यार में ?
जाने ना जाने ना, जग को खबर कब होगी ?

सूरत तेरी बड़ी है प्यारी अखियाँ हैं मतवाली
नज़र उतारूँ तेरी गुरूवर जाऊँ वारी वारी
हाय हाय जोगी रे.............

तेरा रूप है सबसे न्यारा तू सबका रखवाला
सबको नाच नचावे जोगी कैसा भोला भाला
हाय हाय जोगी रे.............

जब से मैंने तुमको देखा छूट गयी मनमानी
साँस साँस में नाम रटूँ तेरा हो गई मैं दीवानी
हाय हाय जोगी रे.............

मेरे दिलबर मेरे रहबर साथ सदा मेरे रहना
दूर न होना हमसे जोगी ऐसा तुमसे कहना
हाय हाय जोगी रे.............

तन मन में बस जाओ जोगी यह है मेरी मर्जी
इसको मेरा भाव समझ लो या समझो खुदगर्जी
हाय हाय जोगी रे.............

तुम ही तुम हो मेरे दिल में और कोई न रहता
मेरी साँसों की सरगम में तेरा नाम है रहता
हाय हाय जोगी रे.............

तेरे प्रेम में मैं बह जाऊँ मूरत मनवा बसाऊँ
तेरा सुमिरन करके जोगी भव सागर तर जाऊँ
हाय हाय जोगी रे.............

तुझसे ही है ये हरियाली महके डाली डाली
जो भी तुमको देखे जोगी छाये मुख पे लाली
हाय हाय जोगी रे............

ज्ञान की ज्योति तुम हो जगाते भक्ति की धारा बहाते
आनंद आनंद सबको आता दौड़ के द्वार पे आते
हाय हाय जोगी रे..........

तेरा दर्शन हर पल माँगू और न माँगू कुछ भी
तेरी इक मुस्कान पे वारूँ अपनी जिंदगी सारी
हाय हाय जोगी रे...........

बुरा हो इन बैरन अखियन का कर बैठीं नादानी
पहले मन में आग लगायी अब बरसाये पानी
हाय हाय जोगी रे...........

तेरे प्रेम में नीर बहाऊँ मूरत मन में बसाऊँ
तेरी याद में मेरे जोगी मैं बलिहारी जाऊँ
हाय हाय जोगी रे..........

उलटी प्रीत है जग की जोगी हाथ पकड़ कर तजना
साँची प्रीत है तेरी जोगी हाथ पकड़ नहीं तजना
हाय हाय जोगी रे...........

तेरे दर्श से मन हो पुलकित आनंद आनंद आये
तेरी अखियाँ ऐसे लागें जैसे हमें बुलायें
हाय हाय जोगी रे...........

चन्दा भी देखा तारे भी देखे देखा सूरज बरसों
जब से मैंने तुमको देखा मन में फूली सरसों
हाय हाय जोगी रे.............

Thursday, May 07, 2009

गुरुदेव मेरे साईं शिव भोले भाले हैं ।
सृष्टि के पालनहार तिरलोक संभाले हैं ॥

ज्यूँ बालक जन्मे राम , घनश्याम ने जन्म लिया
सिखलाई मर्यादा, गीता का ज्ञान दिया
इन दोनों का संगम, "बापू" से पाते हैं
गुरुदेव मेरे साईं शिव भोले भाले हैं ......

दीवानों की दुनिया है , यहाँ हर कोई दीवाना
हर एक का कहना है, वो खुद में है मस्ताना
दीवाने तेरे बापू , कुछ और निराले हैं
गुरुदेव मेरे साईं शिव भोले भाले हैं ......

"शुभ" चरनन में तेरे , मेरी प्रीत बढे गुरुवर
इस जग के चिंतन से, मेरा ध्यान हटे गुरुवर
भक्ति की धारा में, हमको नहलाते हैं
गुरुदेव मेरे साईं शिव भोले भाले हैं ......


रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"

Thursday, February 26, 2009

हरि ॐ : भजन : हरि ॐ

बड़ा सुंदर सा प्यारा सा नाम जिनका
मोटेरा में है धाम जिनका
लोग कहते हैं बापू आसाराम
उनके चरणों में लाखों प्रणाम

निर्धन हो या हो धनवान , समझें सबको एक समान
"शुभ" झलक मिल जाए तो -२ , टूट जाते हैं सारे अभिमान
उनके चरणों में लाखों प्रणाम ......

मुझको रंग दिया भक्ति के रंग में , प्रेम हो गया प्रभु जी के संग में
हो सामने तुम तो पता चले ना -२ , कब हो जाए सुबह कब शाम
उनके चरणों में लाखों प्रणाम ......

दाता तुम हो दया के सिन्धु , जिसको मिल जाए एक बिन्दु
ध्यान धरे जो मन से बापू -२, दिखे तुझमें राम और श्याम
उनके चरणों में लाखों प्रणाम ......

ग्रंथों का मुझे ज्ञान नहीं है , अच्छे-बुरे की पहचान नहीं है
तेरे मुख से निकले ज्ञान की गंगा -२, उसमें करता रहूँ स्नान
उनके चरणों में लाखों प्रणाम ......

रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"

Thursday, December 04, 2008

जीवन रसायन :
१) जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्षों का काम कर लेना होगा । उसे इस युग की रफ़्तार से बहुत आगे निकलना होगा । जैसे स्वप्न में मान-अपमान, मेरा-तेरा, अच्छा-बुरा दिखता है और जागने के बाद उसकी सत्यता नहीं रहती वैसे ही इस जाग्रत जगत में भी अनुभव करना होगा । बस .... हो गया हजारों वर्षों का काम पूरा । ज्ञान की यह बात ह्रदय में ठीक से जमा देने वाले कोई महापुरुष मिल जाएँ तो हजारों वर्षों के संस्कार, मेरे तेरे के भ्रम को दो पल में ही निवृत कर दें और कार्य पूरा हो जाए ।

Wednesday, November 26, 2008

Practice Makes Everything Possible
(Excerpts from the satsanga of Pujya Bapuji)

Vasishthaji, the Guru of Lord Rama, said, “O Ramaji! Is there any thing or state that can’t be
achieved through practice? Ramaji! If only one persists and doesn’t give up losing heart midway,
one definitely achieves his goal.”
Practice makes everything possible. Even Self-knowledge can be attained through practice. ‘I am beaten, I am worried, I am in trouble’ –if you practise brooding over such problems, you
certainly will create problems for yourself. Howsoever great your woes, do not brood over
them. If a speeding car splashes muddy water on you and some of it even enters your mouth,
don’t grumble; rather think positively ‘So many times have I partaken of the Lord’s
charanāmrita; today, I got to taste the charanāmrita of a car!’ When the dirty water has already
entered your mouth, there is no use whining. Be always of good cheer, this is the art of living.
If you continue making persistent efforts without getting tired midway and retracing your steps,
then you will certainly attain your goal. With determined practice you can materialise even nonexistent objects.
There is a detailed account in the ‘Sri Yoga Vasishtha Maharamayana’ about a great ascetic who
desired to become Lord Brahma, the Creator, and became so through determined yogic
practices. But then, how can the Creation have another Creator, i.e. another Lord Brahma? So
profound and intense was his ascetic practice that he created another universe with another
sun; thus becoming another Lord Brahma for his own creation!

The jivātman has miraculous power. He can attain just anything he wants, become as great as
he dreams to be through untiring efforts. With self-effort and relentless perseverance one can
surely attain anything and everything.
‘Whenever there is a true soul to soul affection, union will of a surety follow.’
Maa Parvati got determined to have Lord Shiva as her consort and she succeeded too. Dhruva
aspired for darshana of Lord Vishnu and he finally had it. Shabari wanted to have darshana of
Lord Rama and the Lord came in person to meet her. Dhanna’s persistent entreaties made Lord
Krishna manifest Himself from a stone. Rami Ramdasa, the 8 year old brother of Samartha
Ramadasa, wanted to make Hanumanaji manifest himself in an idol and he succeeded in doing
so, whereupon he even had a talk with Hanumanji and received his blessings as well. Thus he
became famous at the tender age of 8 years.

(Read the complete article in Apr 2008 Rishi Prasad.)

Saturday, August 23, 2008

श्री कृष्ण Janmashtami श्री कृष्ण

Sri Krishna Janmashtami is one of the important famous Hindu festivals that is being celebrated across India. The festival is celebrated with much pomp and gaiety.
According to antecedents, Sri Krishna Janmashtami is the birthday of Lord Krishna, the eighth avatar of Lord Vishnu. The festival is observed on the eighth day of the dark half i.e., Krishna Paksh of the month of August Sravanam / Sravana Maasam / Aavani of Hindu calendar (generally late August or early September of the Gregorian / English calendar month) when the Rohini Star is ascendant.
The festival is observed by fasting on the previous day of Saptami day (the seventh day). This is followed by a night long vigil commemorating the birth of Lord Krishna at night and his immediate removal by his father to a fosterer home for safe keeping. At midnight, the deity of the infant Krishna is bathed, placed in a cradle and worshiped.
In the early morning, ladies draw patterns of little children's feet outside the house with rice-flour paste, walking towards the house। Earlier kids are dressed and decorated as the Lord Krishna during his childhood. This symbolizes the entry of the infant Krishna into his foster-home. This custom is popular in some communities of South India. After ablutions, morning prayers and worship, the devout break their fast with prasadam, food that has first been offered to God. During the fore-noon hours, the "Dahi-Handi" custom is celebrated in some parts of the Deccan. This is followed by sumptuous mid-day feasts, where extended families customarily get together. Sweets made of milk and butter are traditionally prepared on this occasion.
Accept our wishes of Sri Krishna Janmashtami. Jai Jai Sri Radhe

Thursday, July 31, 2008

सूर्य ग्रहण : १ अगस्त २००८ , दिन : शुक्रवार
कुछ आवश्यक जानकारी
॥ ग्रहण विधि निषेध ॥

सूर्यग्रहण मे ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण मे तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये । बूढे बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चंद्र, जिसका ग्रहण हो, उसका शुध्द बिम्ब देख कर भोजन करना चाहिये । (१ प्रहर = ३ घंटे)

ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोडना चाहिए । बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिये व दंत धावन नहीं करना चाहिये ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल मूत्र का त्याग करना, मैथुन करना और भोजन करना - ये सब कार्य वर्जित हैं ।

ग्रहण के समय मन से सत्पात्र को उद्दयेश्य करके जल मे जल डाल देना चाहिए । ऐसा करने से देनेवाले को उसका फल प्राप्त होता है और लेनेवाले को उसका दोष भी नहीं लगता।

कोइ भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिये और नया कार्य शुरु नहीं करना चाहिये ।

ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थो मे तिल या कुशा डाली होती है, वे पदार्थ दुषित नहीं होते । जबकि पके हुए अन्न का त्याग करके गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिये ।

ग्रहण वेध के प्रारंभ मे तिल या कुशा मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति मे ही करना चाहिये और ग्रहण शुरु होने से अंत तक अन्न या जल नहीं लेना चाहिये ।

ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है ।

तीन दिन या एक दिन उपवास करके स्नान दानादि का ग्रहण में महाफल है, किंतु संतानयुक्त ग्रहस्थ को ग्रहण और संक्रान्ति के दिन उपवास नहीं करना चाहिये।

'स्कंद पुराण' के अनुसार ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षो का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है ।

'देवी भागवत' में आता है कि भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये ।


संकलन : http://hariombooks.googlepages.com/hindi_grahan.htm

अनमोल सत्संग : ॐ ॐ

"कपट गाँठ मन में नहीं सबसे सहज स्वभाव ।
नारायण वा संत की नदी किनारे नाव ॥ "
अपनी मानते हैं तो हमको राग पैदा होगा और हम फसेंगे । अपनी भले ही न हो पर आप दूसरों का हित चाहो । हित आए इसीलिए हित मत करो , बस अपना कर्तव्य करो ।

"मेरो चिन्त्यो होत नहीं , हरि को चिन्त्यो होय ।
हरि को चिन्त्यो हरि करे , मैं रहूँ निश्चिंत ॥ "


यदि कार्य शास्त्र अनुकूल हो और हित का हो तो करो । सभी दुनिया के गुरु मिलकर भी एक आदमी को साक्षात्कार नहीं करा सकते जब तक उसमें स्वयं तड़फ पैदा नहीं होगी ।
"ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में टोना ही पड़ेगा.."
वाह-वाही का रस लिया और निंदा हुई तो रोओगे ।
चाहे बहार का सुख हो , चाहे भावना का सुख हो , सदा एक सा नहीं रहेगा । ये प्रकृति का सिद्धांत है ।
सत् तीनों कालों में एक सा होता है . सच और भावनाएं सबकी अलग-अलग हैं ।
आकाश व्यापक है . आकाश का कभी कुछ नहीं बिगड़ता . आकाश सबको ठौर देता है ।
छोटे में छोटा देखना हो तो परमात्मा और बड़े में बड़ा देखना हो तो परमात्मा ।
ये वहम है की हम इतना जप करेंगे तो परमात्मा मिलेगा . अरे .... वो सदा मिला हुआ है ।
सब आता - जाता है पर परमात्मा वाही का वाही । उस परमात्मा को पाए बिना कुछ भी पाया , टिकेगा नहीं ।
"सुन्या सखणा कोई नहीं , सबके भीतर लाल .
मुरख ग्रंथि खोले नहीं , करमी भयो कंगाल .. "


पति से अलग या पत्नी से अलग रहोगे तभी परमात्मा मिलेगा ... नहीं - नहीं ... वो तो सदा मिला हुआ है । हटानी है तो सिर्फ़ अपनी वासना हटाओ फिर चाहे घर में रहो या बाहर .....
करने की शक्ति है तो औरों के लिए करो तो करने की शक्ति का सदुपयोग हो जाएगा । मानने की शक्ति है तो परमात्मा को मानो तो मानने की शक्ति का सदुपयोग हो जाएगा । जानने की शक्ति है तो परमात्मा को जानो तो जानने के शक्ति का सदुपयोग हो जाएगा ।
ईश्वर को पाने की इच्छा मात्र से पा सकते हो , इतना सरल है ।

नारायण हरि --
आज सुबह (३१ जुलाई २००८) सोनी टेलीविजन पर प्रसारित सत्संग के कुछ अनमोल वचन । यह पूज्य गुरुदेव की अमृतमयी वाणी को सुन कर लिखा गया है अतः लिखने में त्रुटि होने की संभावना है । कृपया यदि कोई त्रुटि हो गई हो तो क्षमा करें।

Wednesday, July 30, 2008

अनमोल सत्संग : ॐ ॐ
हरि ॐ .... प्लुत गुंजन .......
निःसंकल्प्ता से विश्रांति मिलती है और सहज अवस्था प्रकट होती है , उसको सहज समाधि भी बोलते हैं ।
भगवान् के नाम रोग मिटाते हैं ।
ॐ अच्युताय नमः - २१ बार मंत्र जप कर पानी पियें अथवा किसी को दें , बहुत लाभ होता है ।
औषधि लेते समय बांया नथुना चले और दांया नथुना बंद कर दें ।
हाजमा ठीक करना हो तो गाय का घी अथवा सरसों का तेल नाभि पर लगायें । जिस प्रकार घड़ी के कांटे घूमते हैं उसी प्रकार नाभि पर हल्की मसाज करें ।
प्रिय वाणी सहित दान कलियुग में बड़ा लाभ देता है । कटु वाणी नहीं , धन का अंहकार नहीं करना चाहिए ।
आठ प्रकार के दान होते हैं लेकिन सत्संग का दान .... आहा ....
भक्ति का दान , सत्संग का दान बहुत ऊँचा है ।
हरि ॐ का उच्चारण करके चुप हो जाते हैं तो ध्यान में विश्राम मिलता है और हमारे दोषों को मिटने की शक्ति मिलती है ।

हरि ॐ ...... गुंजन .....
जितनी देर जप करें उतनी देर चुप हो जायें , बहुत ऊँची साधना हो जायेगी ।
"एक साधे सब सधे ..... "
"कबीरा इह जग आए के , बहुत से किन्हें मीत
जिन दिल बंधा एक से , वो सोये निश्चिंत "
"कबीरा मन निर्मल भयो , जैसे गंगा नीर
पीछे पीछे हरि फिरे , कहत कबीर कबीर "
ब्राह्मण जटाशंकर और संत रैदास की कथा ....

आपके संकल्प में सामर्थ्य तब आता है जब आप चुप हो जाते है ।
हम भगवान् और संतो को तुच्छ चीज देते हैं लेकिन बदले में जो हमें मिलता है वो तो महाराज ....
हम जो देते हैं वो दिखता है और जो दिखता है वो नश्वर है । जो महापुरुष देते हैं उसका तो बखान नहीं किया जा सकता ।

नारायण हरि --
आज सुबह (३० जुलाई २००८) सोनी टेलीविजन पर प्रसारित सत्संग के कुछ अनमोल वचन । यह पूज्य गुरुदेव की अमृतमयी वाणी को सुन कर लिखा गया है अतः लिखने में त्रुटि होने की संभावना है । कृपया यदि कोई त्रुटि हो गई हो तो क्षमा करें।