Param Pujya Sant Shri Asaramji, endearingly called 'Bapu', is a Self-Realized Saint from India. Pujya Bapuji preaches the existence of One Supreme Conscious in every human being; be it Hindu, Muslim, Jain, Christian, Sikh or anyone else. Bapuji represents a confluence of Bhakti Yoga, Gyan Yoga & Karma Yoga. This website is a humble attempt to spread the divine message of Pujya Bapuji.
Thursday, December 04, 2008
१) जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्षों का काम कर लेना होगा । उसे इस युग की रफ़्तार से बहुत आगे निकलना होगा । जैसे स्वप्न में मान-अपमान, मेरा-तेरा, अच्छा-बुरा दिखता है और जागने के बाद उसकी सत्यता नहीं रहती वैसे ही इस जाग्रत जगत में भी अनुभव करना होगा । बस .... हो गया हजारों वर्षों का काम पूरा । ज्ञान की यह बात ह्रदय में ठीक से जमा देने वाले कोई महापुरुष मिल जाएँ तो हजारों वर्षों के संस्कार, मेरे तेरे के भ्रम को दो पल में ही निवृत कर दें और कार्य पूरा हो जाए ।
Wednesday, November 26, 2008
(Excerpts from the satsanga of Pujya Bapuji)
Vasishthaji, the Guru of Lord Rama, said, “O Ramaji! Is there any thing or state that can’t be
achieved through practice? Ramaji! If only one persists and doesn’t give up losing heart midway,
one definitely achieves his goal.”
Practice makes everything possible. Even Self-knowledge can be attained through practice. ‘I am beaten, I am worried, I am in trouble’ –if you practise brooding over such problems, you
certainly will create problems for yourself. Howsoever great your woes, do not brood over
them. If a speeding car splashes muddy water on you and some of it even enters your mouth,
don’t grumble; rather think positively ‘So many times have I partaken of the Lord’s
charanāmrita; today, I got to taste the charanāmrita of a car!’ When the dirty water has already
entered your mouth, there is no use whining. Be always of good cheer, this is the art of living.
If you continue making persistent efforts without getting tired midway and retracing your steps,
then you will certainly attain your goal. With determined practice you can materialise even nonexistent objects.
There is a detailed account in the ‘Sri Yoga Vasishtha Maharamayana’ about a great ascetic who
desired to become Lord Brahma, the Creator, and became so through determined yogic
practices. But then, how can the Creation have another Creator, i.e. another Lord Brahma? So
profound and intense was his ascetic practice that he created another universe with another
sun; thus becoming another Lord Brahma for his own creation!
The jivātman has miraculous power. He can attain just anything he wants, become as great as
he dreams to be through untiring efforts. With self-effort and relentless perseverance one can
surely attain anything and everything.
‘Whenever there is a true soul to soul affection, union will of a surety follow.’
Maa Parvati got determined to have Lord Shiva as her consort and she succeeded too. Dhruva
aspired for darshana of Lord Vishnu and he finally had it. Shabari wanted to have darshana of
Lord Rama and the Lord came in person to meet her. Dhanna’s persistent entreaties made Lord
Krishna manifest Himself from a stone. Rami Ramdasa, the 8 year old brother of Samartha
Ramadasa, wanted to make Hanumanaji manifest himself in an idol and he succeeded in doing
so, whereupon he even had a talk with Hanumanji and received his blessings as well. Thus he
became famous at the tender age of 8 years.
(Read the complete article in Apr 2008 Rishi Prasad.)
Saturday, August 23, 2008
Sri Krishna Janmashtami is one of the important famous Hindu festivals that is being celebrated across India. The festival is celebrated with much pomp and gaiety.According to antecedents, Sri Krishna Janmashtami is the birthday of Lord Krishna, the eighth avatar of Lord Vishnu. The festival is observed on the eighth day of the dark half i.e., Krishna Paksh of the month of August Sravanam / Sravana Maasam / Aavani of Hindu calendar (generally late August or early September of the Gregorian / English calendar month) when the Rohini Star is ascendant.
The festival is observed by fasting on the previous day of Saptami day (the seventh day). This is followed by a night long vigil commemorating the birth of Lord Krishna at night and his immediate removal by his father to a fosterer home for safe keeping. At midnight, the deity of the infant Krishna is bathed, placed in a cradle and worshiped.
In the early morning, ladies draw patterns of little children's feet outside the house with rice-flour paste, walking towards the house। Earlier kids are dressed and decorated as the Lord Krishna during his childhood. This symbolizes the entry of the infant Krishna into his foster-home. This custom is popular in some communities of South India. After ablutions, morning prayers and worship, the devout break their fast with prasadam, food that has first been offered to God. During the fore-noon hours, the "Dahi-Handi" custom is celebrated in some parts of the Deccan. This is followed by sumptuous mid-day feasts, where extended families customarily get together. Sweets made of milk and butter are traditionally prepared on this occasion.
Thursday, July 31, 2008
सूर्यग्रहण मे ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण मे तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये । बूढे बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चंद्र, जिसका ग्रहण हो, उसका शुध्द बिम्ब देख कर भोजन करना चाहिये । (१ प्रहर = ३ घंटे)
ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोडना चाहिए । बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिये व दंत धावन नहीं करना चाहिये ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल मूत्र का त्याग करना, मैथुन करना और भोजन करना - ये सब कार्य वर्जित हैं ।
ग्रहण के समय मन से सत्पात्र को उद्दयेश्य करके जल मे जल डाल देना चाहिए । ऐसा करने से देनेवाले को उसका फल प्राप्त होता है और लेनेवाले को उसका दोष भी नहीं लगता।
कोइ भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिये और नया कार्य शुरु नहीं करना चाहिये ।
ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थो मे तिल या कुशा डाली होती है, वे पदार्थ दुषित नहीं होते । जबकि पके हुए अन्न का त्याग करके गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिये ।
ग्रहण वेध के प्रारंभ मे तिल या कुशा मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति मे ही करना चाहिये और ग्रहण शुरु होने से अंत तक अन्न या जल नहीं लेना चाहिये ।
ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है ।
तीन दिन या एक दिन उपवास करके स्नान दानादि का ग्रहण में महाफल है, किंतु संतानयुक्त ग्रहस्थ को ग्रहण और संक्रान्ति के दिन उपवास नहीं करना चाहिये।
'स्कंद पुराण' के अनुसार ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षो का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है ।
'देवी भागवत' में आता है कि भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये ।
"कपट गाँठ मन में नहीं सबसे सहज स्वभाव ।
नारायण वा संत की नदी किनारे नाव ॥ "
अपनी मानते हैं तो हमको राग पैदा होगा और हम फसेंगे । अपनी भले ही न हो पर आप दूसरों का हित चाहो । हित आए इसीलिए हित मत करो , बस अपना कर्तव्य करो ।
"मेरो चिन्त्यो होत नहीं , हरि को चिन्त्यो होय ।
हरि को चिन्त्यो हरि करे , मैं रहूँ निश्चिंत ॥ "
यदि कार्य शास्त्र अनुकूल हो और हित का हो तो करो । सभी दुनिया के गुरु मिलकर भी एक आदमी को साक्षात्कार नहीं करा सकते जब तक उसमें स्वयं तड़फ पैदा नहीं होगी ।
"ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में टोना ही पड़ेगा.."
वाह-वाही का रस लिया और निंदा हुई तो रोओगे ।
चाहे बहार का सुख हो , चाहे भावना का सुख हो , सदा एक सा नहीं रहेगा । ये प्रकृति का सिद्धांत है ।
सत् तीनों कालों में एक सा होता है . सच और भावनाएं सबकी अलग-अलग हैं ।
आकाश व्यापक है . आकाश का कभी कुछ नहीं बिगड़ता . आकाश सबको ठौर देता है ।
छोटे में छोटा देखना हो तो परमात्मा और बड़े में बड़ा देखना हो तो परमात्मा ।
ये वहम है की हम इतना जप करेंगे तो परमात्मा मिलेगा . अरे .... वो सदा मिला हुआ है ।
सब आता - जाता है पर परमात्मा वाही का वाही । उस परमात्मा को पाए बिना कुछ भी पाया , टिकेगा नहीं ।
"सुन्या सखणा कोई नहीं , सबके भीतर लाल .
मुरख ग्रंथि खोले नहीं , करमी भयो कंगाल .. "
पति से अलग या पत्नी से अलग रहोगे तभी परमात्मा मिलेगा ... नहीं - नहीं ... वो तो सदा मिला हुआ है । हटानी है तो सिर्फ़ अपनी वासना हटाओ फिर चाहे घर में रहो या बाहर .....
करने की शक्ति है तो औरों के लिए करो तो करने की शक्ति का सदुपयोग हो जाएगा । मानने की शक्ति है तो परमात्मा को मानो तो मानने की शक्ति का सदुपयोग हो जाएगा । जानने की शक्ति है तो परमात्मा को जानो तो जानने के शक्ति का सदुपयोग हो जाएगा ।
ईश्वर को पाने की इच्छा मात्र से पा सकते हो , इतना सरल है ।
नारायण हरि --
आज सुबह (३१ जुलाई २००८) सोनी टेलीविजन पर प्रसारित सत्संग के कुछ अनमोल वचन । यह पूज्य गुरुदेव की अमृतमयी वाणी को सुन कर लिखा गया है अतः लिखने में त्रुटि होने की संभावना है । कृपया यदि कोई त्रुटि हो गई हो तो क्षमा करें।
Wednesday, July 30, 2008
हरि ॐ .... प्लुत गुंजन .......
निःसंकल्प्ता से विश्रांति मिलती है और सहज अवस्था प्रकट होती है , उसको सहज समाधि भी बोलते हैं ।
भगवान् के नाम रोग मिटाते हैं ।
ॐ अच्युताय नमः - २१ बार मंत्र जप कर पानी पियें अथवा किसी को दें , बहुत लाभ होता है ।
औषधि लेते समय बांया नथुना चले और दांया नथुना बंद कर दें ।
हाजमा ठीक करना हो तो गाय का घी अथवा सरसों का तेल नाभि पर लगायें । जिस प्रकार घड़ी के कांटे घूमते हैं उसी प्रकार नाभि पर हल्की मसाज करें ।
प्रिय वाणी सहित दान कलियुग में बड़ा लाभ देता है । कटु वाणी नहीं , धन का अंहकार नहीं करना चाहिए ।
आठ प्रकार के दान होते हैं लेकिन सत्संग का दान .... आहा ....
भक्ति का दान , सत्संग का दान बहुत ऊँचा है ।
हरि ॐ का उच्चारण करके चुप हो जाते हैं तो ध्यान में विश्राम मिलता है और हमारे दोषों को मिटने की शक्ति मिलती है ।
हरि ॐ ...... गुंजन .....
जितनी देर जप करें उतनी देर चुप हो जायें , बहुत ऊँची साधना हो जायेगी ।
"एक साधे सब सधे ..... "
"कबीरा इह जग आए के , बहुत से किन्हें मीत
जिन दिल बंधा एक से , वो सोये निश्चिंत "
"कबीरा मन निर्मल भयो , जैसे गंगा नीर
पीछे पीछे हरि फिरे , कहत कबीर कबीर "
ब्राह्मण जटाशंकर और संत रैदास की कथा ....
आपके संकल्प में सामर्थ्य तब आता है जब आप चुप हो जाते है ।
हम भगवान् और संतो को तुच्छ चीज देते हैं लेकिन बदले में जो हमें मिलता है वो तो महाराज ....
हम जो देते हैं वो दिखता है और जो दिखता है वो नश्वर है । जो महापुरुष देते हैं उसका तो बखान नहीं किया जा सकता ।
नारायण हरि --
आज सुबह (३० जुलाई २००८) सोनी टेलीविजन पर प्रसारित सत्संग के कुछ अनमोल वचन । यह पूज्य गुरुदेव की अमृतमयी वाणी को सुन कर लिखा गया है अतः लिखने में त्रुटि होने की संभावना है । कृपया यदि कोई त्रुटि हो गई हो तो क्षमा करें।
Friday, July 25, 2008
सावन में भगवान् शिव जी की पूजा का विशेष महत्त्व है । बिल्व पत्र भगवान् शंकर को बहुत प्रिय हैं । बिल्व के तीन पत्र माना रजो गुण, तमो गुण और सतो गुण भगवान् शंभ सदाशिव को अर्पित कर देना । बिल्व पत्र वायु सम्बन्धी रोगों को समाप्त करता है ।
बुद्धि की ऊंचाई का फल है परिस्थितियों में सम रहना ।
मरने वाले शरीर को हम अपना मानते हैं इसीलिए हम सोये हुए हैं ।
"मोह निशा सब सोवन हारा ..... "
सारे विश्व का राज्य मिल जाए और ब्रह्म सुख न मिला तो भी घाटा है ।
तीन टूक कोपीन की भाजी बिना लूण .....
"वो ना थे मुझ से दूर ना मैं उनसे दूर था ।
आता ना नजर तो नजर का कसूर था ॥ "
मनुष्य जन्म सार्थक करने के लिए बुद्धि मिली है । खाली पेट भरने के लिए , मजदूरी करके जीवन बिताने के लिए ही हमारा जन्म नही हुआ है ।
ह्रदय में बसे हृदयेश्वर को पाने के लिए वास्तविकता में हमारा जन्म हुआ है ।
मनुष्य तू इतना ऊँचा है कि तू भगवान् का गुरु बन सकता है , भगवान् का भक्त बन सकता है , भगवान् का सखा बन सकता है , भगवान् का मित्र बन सकता है , भगवान् का प्रेमी बन सकता है और तो और भगवान् का माँ -बाप भी बन सकता है ।
भगवान् भाव के भूखे हैं वो किसी व्यंजन इत्यादि से खुश नही होते ।
बुद्धि का आदर करना है तो ये बात ठान लो कि एक है नित्य और एक है अनित्य । प्रकृति अनित्य है और परमात्मा नित्य है ।
सावन में हरा शाक और दूध ज्यादा नहीं लेना चाहिए ।
बिनु सत्संग विवेक न होई , राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ..
नारायण हरि
--आज सुबह (२५ जुलाई २००८) सोनी टेलीविजन पर प्रसारित सत्संग के कुछ अनमोल वचन ।
यह पूज्य गुरुदेव की अमृतमयी वाणी को सुन कर लिखा गया है अतः लिखने में त्रुटि होने की संभावना है । कृपया यदि कोई त्रुटि हो गई हो तो क्षमा करें।
Thursday, July 24, 2008
सारा जगत वासुदेव की सत्ता से भरा हुआ है ।
भले वासुदेव परमात्मा का अनुभव अभी ना होता परन्तु ये पक्का कर लो की वह सर्व व्याप्त है ।
ऐसा खेल रच्यो मेरे दाता , जहाँ देखूं वहां तू को तू ......
वासुदेव सर्वमिति ....
मेरे मन की हो! यदि ऐसी भावना है तो बड़ा भारी दोष है ।
भगवन बड़े दयालु हैं की सब हमारी चाही नही होती . गुरुदेव ने बहुत से उदाहरण भी दिए ।
अपनी चाही का आग्रह मत करो ।
नौ ग्रह भी इतना नुक्सान नही कर सकते जितना अपनी चाही जैसा ग्रह नुक्सान कर सकता है ।
किसी को डांटना भी पड़ता है तो "परस्परं भावयन्तु" के भाव रखते हुए कि उसका मंगल कैसे हो? उसका विकास कैसे हो?
करने की शक्ति , मानाने की शक्ति और जानने की शक्ति का सदुपयोग करो ।
परमात्मा जो समग्र सृष्टि को चला रहा है वो तुम्हारा परम हितैषी है , ऐसा अडिग विश्वास रखो ।
जानो तो अपने को जानो , करो तो दूसरों के हित की करो और मानो तो प्रभु को मानो ।
संत कबीर वाणी :
"हरि सम जग कछु वास्तु नहीं , प्रेम पंथ सम पंथ .
सतगुरु सम सज्जन नहीं , गीता सम नहीं ग्रन्थ "
नारायण हरि
--आज सुबह (२४ जुलाई २००८) सोनी टेलीविजन पर प्रसारित सत्संग के कुछ अनमोल वचन ।
यह पूज्य गुरुदेव की अमृतमयी वाणी को सुन कर लिखा गया है अतः लिखने में त्रुटि होने की संभावना है । कृपया यदि कोई त्रुटि हो गई हो तो क्षमा करें।
Tuesday, July 22, 2008
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द
गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु मेरा देऊ , अलख अभेऊ , सर्व पूज चरण गुरु सेवऊ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु का दर्शन .... देख - देख जीवां , गुरु के चरण धोये -धोये पीवां
गुरु बिन अवर नही मैं ठाऊँ , अनबिन जपऊ गुरु गुरु नाऊँ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु मेरा ज्ञान , गुरु हिरदय ध्यान , गुरु गोपाल पुरख भगवान्
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
ऐसे गुरु को बल-बल जाइये ..-२ आप मुक्त मोहे तारें ..
गुरु की शरण रहो कर जोड़े , गुरु बिना मैं नही होर
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु बहुत तारे भव पार , गुरु सेवा जम से छुटकार
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
अंधकार में गुरु मंत्र उजारा , गुरु के संग सजल निस्तारा
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु पूरा पाईया बडभागी , गुरु की सेवा जिथ ना लागी
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
संकलित : पंजाबी भजन
Thursday, July 17, 2008
बापूजी ने इस मंत्र का जप बताया है गुरुकुल की शान्ति हेतु :
OM NAMO SIDDHI VINAYKAY GURUKUL ASHRAME SHANTI KARTRE SARVA VIGHNA PRASHMNAY SHRI OM SWAHA !!
ॐ नमो सिद्धि विनायकाय गुरुकुल आश्रम शांति कर्तरे सर्व विघ्न प्रशम्नाय श्री ॐ स्वाहा ।
अधिकं जपं , अधिकं फलं । अतः अधिक से अधिक इस मंत्र का जप करने की कृपा करें ।
Tuesday, July 15, 2008
अनमोल वचन :
सर्व दृश्य को भूलना
जानके असत् संसार ।
चित्त ब्रह्म में लीन कर
यही है सच्चा सार ॥
- परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू
'गीता'
विवेकरूपी वृक्षों का
एक अपूर्व बगीचा है
यह सब सुखों की नींव है
सिद्धान्त-रत्नों का भण्डार है
नवरसरूपी अमृत से
भरा हुआ समुद्र है
खुला हुआ परम धाम है और
सब विद्याओं की मूल भूमि है
- संत ज्ञानेश्वर महाराज
Tuesday, July 08, 2008
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं वग्वादिनि सरस्वति मम जिह्वाग्रे वद वद ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं नमः स्वाहा
इस मंत्र को आषाढ मास मे जब उत्तराषाढा नक्षत्र हो तब अर्थात 18 जुलाई २००८ को दिन मे १०८ बार जप ले
फिर इसी दिन की रात्रि के समय ११ से १२ बजे के बीच जीभ पर लाल चंदन से ' ह्रीं ' मन्त्र लिख दे
जिसकी जीभ पर यह मंत्र इस विधि से लिखा जायेगा, उसे विद्या लाभ तथा विद्वत्ता की प्राप्ति होगी
सभी लोग इसका लाभ ले तथा दुसरो को दिलावे
Monday, June 30, 2008
तुम जियो तो ऐसा जियो कि जिसे देखो उसमें बस, अपना आत्मा-ब्रह्म दिखे
ऐसा खाओ कि जो खाओ वह प्रसाद हो जाए ।
जीवन बड़ा कीमती है वैमनस्य और विग्रह से अपने शक्तियों को क्षीण क्यों करना ?
व्यर्थ की चर्चा और व्यर्थ का वाणी-विलास करने से अपनेको बचाओ
सत्य परमात्मा में मन को लगाओ इसी जीवन में धन्यता का अनुभव करो
- परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू
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बारह कोस चलकर जाने से भी यदि सत्पुरुष के दर्शन मिलते हों तो मैं पैदल चलकर जाने के लिए तैयार हूँ क्योंकि ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष के दर्शन से कैसा आध्यात्मिक लाभ मिलता है वह मैं अच्छी प्रकार से जानता हूँ
- स्वामी विवेकानन्द
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तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना
अमानिना मानदेन कीर्तनीयो सदा हरिः
तिनके से भी हलका, वृक्ष से भी अधिक सहनशील, स्वयं मान रहित रहकर तथा दूसरों को मान देकर नित्य भगवान श्रीहरि के नाम का संकीर्तन करना चाहिए
- चैतन्य महाप्रभु
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धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः धन्या च वसुधा देवी यत्र स्याद गुरुभक्तता
हे पार्वती ! जिसके अन्दर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका कुल गोत्र / वंश धन्य है, उसके वंश में, जन्म लेनेवाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है
- भगवान शिवजी
Thursday, June 05, 2008
An old deaf man regularly attended the satsanga of a saint. He suffered from neural deafness. He was as deaf as a post and couldn't hear even a single word. Somebody informed the saint, “Babaji! That old man sitting there is totally deaf even though he occasionally laughs in the course of the satsanga.”
Deaf people laugh twice – first, when all laugh in the course of satsanga and the second, when they figure out what might have transpired.
Babaji said, “Why does he come to satsanga if he is deaf? He comes every day and is always right on time. He keeps sitting for hours. He is not even among those who slip away in the middle of satsanga.”
Babaji thought, 'If he is deaf and cannot listen; how can he enjoy, and without enjoyment he should have left; but he stays put all the while!'
Babaji called the old man near and said in a loud voice into the old man's ears, “Can you listen to the satsanga?”
The old man said, “What did you say, Babaji?”
Babaji raised the loudness of his voice further and said, “Do you hear me?”
“Where do you want me to go?”
Babaji realized that he was totally deaf. He took a paper and pen from the attendant and queried the old man in writing.
The old man said, “My hearing is completely impaired. I cannot hear a word.”
The dialogue continued through the medium of written words.
“Then, why do you come to satsanga?”
“Babaji! I can not hear but I do know that God-Realized one's get absorbed in the Supreme Self before speaking. When a worldly man speaks, his words originate from the mind and the intellect; but the words of a Knower of the Supreme Brahman originate from the Atman. Of course, I cannot listen to your ambrosial words, but their pious vibrations do touch my persona. Secondly, I also earn the merit of sitting amidst the holy souls who come to listen to your nectarine precepts.”
“I am the eldest member of my family. The younger ones tend to follow in the footsteps of the elders. As I come to satsanga, my elder son too has started coming here. Previously, I even resorted to some tricks to bring him to the satsanga. I brought him here and he in turn brought his wife. The wife brought the children. Slowly the entire family has started coming to satsanga. The whole family is inclined to attend the satsanga.”
Never mind if the discourse on Brahman, or the satsanga of Self-Knowledge is not understood. Even if one is not able to hear, simply attending it earns one so much religious merit that sins and afflictions of his countless births are destroyed. One's entire family is also benefitted. Now, can there be any doubt that he who listens to it with rapt attention and reverence then reflects and contemplates on it constantly, will attain the Final Salvation?
Saturday, April 26, 2008
Monday, April 21, 2008
करो संकल्प कुछ बढ़ कर , घड़ी यह आज आई है
मुबारक जन्म दिन तुमको , बधाई है - बधाई है
बधाई है तुमने स्वार्थ सुख को व्यर्थ समझा है
बधाई है कि तुमने जिन्दगी का अर्थ समझा है
लगे तुम मानने परमार्थ ही सच्ची कमाई है
बधाई है कि पहनी तुमने, सदगुण की सुमन माला
बधाई है कि तुमने महाकाल को ही है पहचाना
ये सुरभि सत्कर्म की आदत तुममे सदा समाई है
हटाई है कि तुमने दंभ ईर्ष्या द्वेष जीवन से
बधाई है कि ह्रदय में प्यार अनंत रखने को
बदलता है जगत ये बात जग को नित्य सिखाई है
बधाई है कि तुमने व्रत लिया है लोक मंगल का
बधाई है कि समझा है लक्ष्य जीवन के हर पल का
करो "शुभ" लक्ष्य जीवन का घड़ी यह आज आई है
करो संकल्प कुछ बढ़ कर घड़ी यह आज आई है
नारायण हरि
तीन लोक की मेरे दाता करे रखवाली
कैसे - कैसे अनुभव अपने दुनिया को बतलायें
महिमा तेरी गा पायें वो शब्द कहाँ से लायें
तेरे नाम की ज्योत से है -२ दुनिया उजियाली ,
शान निराली साँई तेरी शान निराली .....
मुख मंडल पर आभा ऐसे जैसे सूरज चमके
एक झलक से छंट जाते हैं काले बदल गम के
भर देते हैं झोली उसकी -२ जो भी आता खाली
शान निराली साँई तेरी शान निराली .....
ब्रह्मज्ञान का दिया जलाकर जग उजियारा करते
सत्संग रुपी गंगाजल से सबको निर्मल करते
हर दर पर ना मस्तक टेकें -२ हम बापू के सवाली
शान निराली साँई तेरी शान निराली .....
संत शरण जो जन पड़े वो जन उद्धरणहार
संत की निंदा नानका बहुरि - बहुरि अवतार
सत्संग रुपी "शुभ" अमृत की -२ भर-भर देते प्याली
शान निराली साँई तेरी शान निराली .....
मैं मेरी के फंद हटाकर प्रभु से नाता जोड़ते
सुनकर के फरियाद भगत की नंगे पैरों दौड़ते
हमने पाकर शरण गुरु की -२ किस्मत अपनी जगा ली
शान निराली साँई तेरी शान निराली .....
रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
Thursday, April 17, 2008
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एक दिन भगवान श्री राम चंद्र जी और भगवती सीता जी झूले पर विराजमान थे । हनुमान जी आए और झूला झुलाने लगे । सीता जी ने कहा : "हनुमान ! पानी ... " रामजी ने कहा : "झूला चलाओ ." हनुमान जी झूले की रस्सी हाथ में लिए हुए पानी लेने गए ; झूला भी झूल रहा है और पानी भी ले आए ।
इस तरह हनुमानजी पूरी कुशलता से कर्म करते । कार्य की सफलता का सामर्थ्य कहाँ है , यह जानते हैं हनुमानजी । वे विश्रांति पाना जानते हैं । हनुमान जी को न परिणाम का भय है , न कर्मफल के भोग की कामना है, न लापरवाही है और न पलायनवादिता है ।
Tuesday, April 15, 2008
हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे
गुरूजी हमारे , भक्तों के दुलारे
हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे
देखो मेरे गुरुवर की शान निराली , सत्संग की भर -भर देते प्याली
किया भक्तों का उद्धार गुरुजी हमारे , हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे ...
कैसा मंगल दिवस है आया , भक्तों ने बड़ी धूम से मनाया
कीर्तन की बहती बयार गुरुजी हमारे , हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे ...
जन्म से पहले सौदागर आया , सुंदर सा एक झूला भी लाया
हुआ धरती पर अवतार गुरुजी हमारे , हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे ...
ज्ञान गगन के सूर्य हैं बापू , शील शांत माधुर्य हैं बापू
सोलह कला के अवतार गुरुजी हमारे , हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे ...
"शुभ" जगत में आनंद छाया , मंगलाचरण सारे विश्व में गाया
कलिकाल में तारणहार गुरुजी हमारे , हुए अवतरित हैं आज गुरूजी हमारे ...
रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
Friday, April 11, 2008
पिता थाऊमल के घर जन्मे -२ , तेरी जय हो मेह्गिबा के लाल
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
मैं वारी जाऊँ बापू जी , बलिहारी जाऊँ बापू जी
मोटेरा तेरा धाम है -२ , तेरे भक्त आवे दरबार
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
भक्तो के तुम कष्ट मिटते -२ , तेरी महिमा अपरम्पार
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
भक्त जो नाम दान हैं लेते -२ , वो तर जावें भव पार
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
आप तो बापू ज्ञान बांटते -२ , रहे भरा ज्ञान भंडार
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
ध्यान योग में ख़ुद को तपाया -२ , बने आसुमल से आसाराम
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
नाथ सुनाऊँ अनुभव अपना -२ , हो गया हरि से प्यार
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
हम भी बापू बालक तेरे -२ , "शुभ" चरणों में पावे वास
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....
रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"